सेना के जवान नहीं होते तो आज वह अपने पहले बच्चे का मुंह नहीं देख पाते। उनके परिवार में किलकारी नहीं गूंज पाती। परिवार में पहले बच्चे के जन्म को लेकर बहुत कुछ सोचा था, लेकिन कुदरत के फेर ने ऐसा फंसाया कि उन्हें डर लगने लगा था कि वह बच्चे को खो देंगे।
यह शब्द थे घाटी के वटवाड़ा में रोजीरोटी कमाने गए ज्यौडि़यां के पास जख मलाल गांव के दर्शन कुमार और उसकी पत्नी निशा कुमारी के।
सोमवार को टेक्निकल एयरपोर्ट पहुंचे दर्शन ने बताया कि डाक्टरों ने उनकी पत्नी की प्रसूति की तारीख सितंबर के पहले सप्ताह में बताई थी। उन्होंने बताया कि वह अपने पहले बच्चे के स्वागत के लिए बहुत तैयारी कर रखी थी।
लेकिन कुदरत के कहर ने उन्हें और उनकी पत्नी को बाढ़ के मंजर में ऐसा फंसाया कि वह चार दिन तक किराये के मकान में ऊपरी मंजिल में फंसे रहे। एनडीआरएफ और सेना के जवानों की टीमों के पहुंचने पर उनकी पत्नी को स्थानीय अस्पताल पहुंचाया।
दर्शन ने बताया कि आठ सितंबर को अस्पताल में उनके बेटे का जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि अगर सेना के जवान समय पर न पहुंचते तो वह अपनी पत्नी और बच्चे को खो देते। सेना भगवान बनकर आई, वह इसे कभी नहीं भूलेंगे।