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अपराजिता: 100 मिलियन स्माइल्स, सुरक्षित समाज में रहना हर नारी का बुनियादी हक

Sat, 14 Sep 2019 12:54 AM IST
Pranjal Dixit न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू

सार

  • छात्राओं ने कहा कि इस तरह की प्रतियोगिताएं होती रहनी चाहिए
  • इससे ऐसी सामाजिक कुरीतियों के बारे में नई पीढ़ी में भी जागरूकता आएगी
  • छात्राओं और समूचे महिला वर्ग के सशक्तीकरण की दिशा में यह प्रशंसनीय कार्य है
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अपराजिता : 100 मिलियन स्माइल्स - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला के ‘अपराजिता : 100 मिलियन स्माइल्स’ अभियान के तहत साबिर नैटिक हाई स्कूल, बंदूरख में शुक्रवार को पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस दौरान छात्राओं ने पेंसिल व रंगों से चित्रकारी करते हुए महिला सशक्तीकरण का संदेश दिया। इसके तहत छात्राओं ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, भ्रूण हत्या पर रोक जैसे मामलों पर पेंटिंग की। छात्राओं ने अपने कला-कौशल का प्रदर्शन किया। वहीं भ्रूण हत्या, दहेज उत्पीड़न जैसे मुद्दों को उठाकर महिला वर्ग के लिए सुरक्षित समाज को बुनियादी हक बताया।
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छात्राओं ने कहा कि इस तरह की प्रतियोगिताएं होती रहनी चाहिए। इससे ऐसी सामाजिक कुरीतियों के बारे में नई पीढ़ी में भी जागरूकता आएगी। छात्राओं और समूचे महिला वर्ग के सशक्तीकरण की दिशा में यह प्रशंसनीय कार्य है। इस दौरान साबिर नैटिक हाई स्कूल की सिमरन दाश, भूमि मिनिया, आंचल दीप, अनन्या गुप्ता आदि छात्राओं ने पेंटिंग के जरिये इन मुद्दों को उठाया।
 

अमर उजाला की यह पहल सराहनीय है। समाज में जागरूकता लाने के लिए इस तरह के कार्यक्रम आगे भी होते रहने चाहिए। भगवान ने भी महिलाओं को पहला स्थान दिया है। जैसे सीता-राम, राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर आदि। मुझे लगता है वैसे ही समाज में भी महिलाओं को पहला स्थान मिलना चाहिए।- प्रीति शर्मा, डायरेक्टर, साबिर नैटिक हाई स्कूल

 

मैं अमर उजाला के इस कदम की प्रशंसा करती हूं। अगर ऐसे कदम उठाए जाएं तो नई पीढ़ी की छात्राओं को सशक्त किया जा सकता है। स्कूलों में इस तरह की प्रतियोगिता करवाकर विद्यार्थियों को समाज के महत्वपूर्ण विषय के बारे में जागरूक किया जा सकता है। समाज में नई चेतना जगाई जा सकती है। - प्रियंका दुबे, अध्यापिका, साबिर नैटिक हाई स्कूल

 

एक शिक्षित महिला कई परिवारों को शिक्षा से जोड़ने का काम करती है। वर्तमान में हर क्षेत्र में महिला अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही है। महिला अपनी शक्ति को भूल चुकी है। वास्तव में नारी अबला नहीं है। जो मां-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए। हमें जागरूक होना होगा। - सिमरन दाश, छात्रा 

 

मुझे लगता है कि ऐसे कार्यक्रम होना बहुत ही जरूरी है। इससे समाज में लड़कियों के प्रति नजरिया बदला जा सकता है। लोग लड़कियों को कमजोर समझते हैं पर यह नहीं जानते कि जिम्मेदारी का बोझ पड़ने पर बेटियां ऑटो रिक्शा और ट्रेन चलाने से भी पीछे नहीं हटतीं। अंतरिक्ष तक में बेटियां पहुंच चुकी हैं। - भूमि मीनिया, छात्रा 

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