दिवाली पर वायु और ध्वनि प्रदूषण ज्यादा न हो, इसके लिए लोग पटाखे कम से कम चलाएं। इससे सभी की भलाई होगी। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चार साल के वायु और ध्वनि प्रदूषण के रिकार्ड को देखने के बाद यह कहना आसान होगा कि इस बार दिवाली पर जमकर हवा में जहर घुलने की आशंका है।
अगस्त 2015 में वायु प्रदूषण सामान्य के स्तर से अधिकतम आया है। जिंक जैसे अन्य कई घातक केमिकल पटाखों में इस्तेमाल होते हैं, जो सांस के जरिए शरीर में जाते हैं। इससे अस्थमा और एलर्जी से ग्रस्त लोगों को बड़ी मुश्किलें होती हैं।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पिछले कई साल से नरवाल स्थित बोर्ड कार्या, एमएएम स्टेडियम और बाड़ी ब्राह्मणा में मापक यंत्र लगाकर वायु प्रदूषण रिकार्ड कर रहा है। गांधीनगर गोल मार्केट, बख्शी नगर, रिहाड़ी चुंगी और परेड में ध्वनि प्रदूषण रिकार्ड किया जा रहा है।
नाक के जरिये शरीर में जाने वाले कण यानी सस्पेंडेंड पार्टिकुलेट मेटर (एसपीएम) और सांस के जरिए अंदर जाने वाले कण यानी रेस्पायरेबल सस्पेंडेंड पार्टिकुलेट मेटर (आरएसपीएम) की मात्रा दिवाली पर अधिक बढ़ जाती है।
पटाखों से आसमान पर छाने वाला धुआं भले ही 48 घंटों साफ हो जाता है, लेकिन केमिकल का असर हवा में एक सप्ताह तक रहता है। सांस की बीमारियों से पीड़ितों को इससे खासी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।
पटाखों की आवाज से बुजुर्गों और छोटे बच्चों को दिक्कतें हो सकती है। प्रदूषण बोर्ड, एजेंसियां और एनजीओ भले ही प्रदूषण कम करने को लोगों को प्रेरित करती रही हैं, लेकिन हर साल दिवाली पर सामान्य से ज्यादा प्रदूषण होता है।