जम्मू - कश्मीर एवं लद्दाख में तैनात एजीएमयूटी कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों की तैनाती अब से ‘कठिन क्षेत्र’ में तैनाती मानी जाएगी। केंद्र सरकार ने इस संबंध में फैसला ले लिया है और अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम यूनियन टेरिटरी (एजीएमयूटी) कैडर-2016 के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों की तैनाती से संबंधित दिशा-निर्देशों को संशोधित कर दिया गया है।
जम्मू और कश्मीर को 5 अगस्त 2019 को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटे जाने के बाद जनवरी 2021 में जम्मू और कश्मीर कैडर को एजीएमयूटी में शामिल कर दिया गया था। गृह मंत्रालय द्वारा इस बारे में जारी एक पत्र में कहा गया है, जम्मू-कश्मीर कैडर को एजीएमयूटी में शामिल करने के बाद इस मुद्दे का परीक्षण किया गया।
जरूरी प्राधिकारियों की मंजूरी के बाद जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित क्षेत्र और लद्दाख केंद्र शासित क्षेत्र की तैनाती को कठिन क्षेत्र तैनाती मानी जाएगी। इसी के अनुसार इस कैडर के अधिकारियों के तबादले के दिशानिर्देशों को संशोधित कर दिया गया है और इसके अनुरूप एजीएमयूटी कैडर को सामान्य और कठिन दो भागों में बांट दिया गया है।
दिल्ली, चंडीगढ़, गोवा, पुडुचेरी, दादर नगर हवेली और दमन एवं दीव सामान्य श्रेणी में
दिल्ली, चंडीगढ़, गोवा, पुडुचेरी, दादर नगर हवेली और दमन एवं दीव की तैनाती को सामान्य क्षेत्र तैनाती माना जाएगा और इसे वर्ग ए में रखा गया है जबकि अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की तैनाती को कठिन क्षेत्र मानते हुए वर्ग बी में रखा गया है।
एनसी नेता उमर अब्दुल्ला
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उमर अब्दुल्ला ने केंद्र पर साधा निशाना- राज्यों से बिना पूछे आईएएस, आईपीएस के तबादले संघीय ढांचे में एक कील
श्रीनगर। नेशनल कांफ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने वीरवार को कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों के तबादले के संबंध में केंद्र सरकार का निर्णय देश के संघीय ढांचे के ताबूत में एक और कील ठोकने के समान होगा।
उमर मीडिया में आई उन खबरों पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे, जिनमें कहा गया है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों की मंजूरी लेने की आवश्यकता को खत्म करते हुए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के माध्यम से आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को स्थानांतरित करने की शक्तियां हासिल करने की योजना बना रही है।
उन्होंने ट्वीट किया, यह भारत के संघीय ढांचे के ताबूत में एक और कील होगी। मान लीजिये कि यदि मोदी मुख्यमंत्री हों और प्रधानमंत्री उनके राज्य के पुलिस महानिदेशक या मुख्य सचिव को हटा दें तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? जम्मू-कश्मीर ने 2019 में ही नियुक्ति की अपनी सभी शक्तियां खो दी थीं, और अब ऐसा लग रहा है कि भारत के बाकी राज्यों के साथ भी ऐसा ही होने वाला है।