इस आधार पर जम्मू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 19 सितंबर को जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 10 अक्तूबर को होगी। इसी क्रम में श्राइन बोर्ड के संबंधित अधिकारियों के बयान भी दर्ज किए जाने हैं।
चढ़ावे का मामला जम्मू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत में चल रहा है। दीपक शर्मा की शिकायत में चढ़ावे की चांदी में मिलावट, उसे बदलने, चोरी और संभावित रकम के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने करीब 20 टन चांदी की कीमत करीब 550 करोड़ रुपये बताई है। इन आरोपों की अभी जांच चल रही है। अभी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।
चढ़ावे के सफर की हर कड़ी जोड़ रही पुलिस
पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार अब तक श्राइन बोर्ड के अधिकारियों, पुजारियों, भवन में तैनात सीआरपीएफ कर्मियों, जम्मू-कश्मीर पुलिस और श्राइन बोर्ड के सुरक्षा कर्मियों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। इनसे चढ़ावे को प्राप्त करने, अलग करने और स्ट्रांग रूम में रखने की प्रक्रिया की जानकारी ली गई है। अब यह देखा जा रहा है कि भवन से चढ़ावे को कटड़ा तक किस तरह ले जाया गया और इसके बाद उसके साथ क्या प्रक्रिया अपनाई गई। इसके लिए पुलिस ने श्राइन बोर्ड से संबंधित सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने के लिए कहा है। फुटेज में दर्ज गतिविधियों का मिलान संबंधित अधिकारियों के बयान के साथ किया जा रहा है।
18 अगस्त को मिले 116 पेज के रिकॉर्ड
श्राइन बोर्ड ने 18 अगस्त को पुलिस को 116 पेज के दस्तावेज उपलब्ध कराए। इनमें चढ़ावे की चांदी के रखरखाव, भंडारण, परिवहन और आगे की प्रक्रिया से संबंधित आदेश, नियम, एसओपी, दिशा-निर्देश और निर्धारित प्रक्रियाओं के रिकॉर्ड शामिल हैं। पुलिस ने सरकारी टकसाल से जुड़े रिकॉर्ड भी मांगे हैं। पुलिस के अनुसार उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डेटा काफी मात्रा में हैं
जिला मजिस्ट्रेट ने मवेशियों के परिवहन पर लगाई रोक
जिला मजिस्ट्रेट राकेश मन्हास ने मंगलवार को मवेशियों के परिवहन पर रोक के आदेश जारी किए हैं। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जम्मू जिले से दूसरे जिलों में गाय, भैंस, बैल, सांड और बछड़ों जैसे मवेशियों को ले जाने पर रोक लगा दी है। आदेश के मुताबिक अब मवेशियों के परिवहन के लिए जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट से मंजूरी लेनी जरूरी होगी। यह आदेश जारी होने की तारीख से दो महीने तक या आदेश वापस लिए जाने तक (जो भी पहले हो) लागू रहेगा। आदेश का उल्लंघन करने पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत कार्रवाई की जाएगी।