पहले बार्डर पर फायरिंग, फिर पाक और भारत सैन्य अफसरों की बैठक और इसके एक दिन बाद सरहद पर मिली सुरंग आतंकियों को घुसपैठ कराने की पाकिस्तानी सैनिकों की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। यही नहीं, सरहद पर खोदी जाने वाली सुरंगें पाकिस्तानी सैनिक खोदते हैं। इसके लिए रेंजरों का एक विशेष दस्ता है।
यह विशेष दस्ता फारवर्ड पोस्टों पर बतौर संतरी भी तैनात रहता है।यह विशेष दस्ता पूरी रणनीति के तहत खुदाई करता है। सबसे पहले खुदाई के लिए मानसून का इंतजार किया जाता है। इसके बाद जब कठुआ, सांबा और जम्मू जिलों के इंटरनेशनल बार्डर पर धान की फसल लगती है।
यह फसल जब पकने की स्टेज पर पहुंचती है तो पाक के सैनिक खुदाई शुरू कर देते हैं। दरअसल, धान के लगने से पकने तक जमीन में नमी रहती है। इससे खुदाई करने में आसानी होती है। इसके बाद आतंकियों को सुरंग से घुसपैठ कराई जाती है। पिछले पांच साल में जब भी सीमा पर सुरंग मिली है, तो वह नवंबर, दिसंबर, फरवरी, मार्च के महीने में मिली है।
खुदाई के लिए धान की खेती का करते हैं इंतजार
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सीमा के पास पाकिस्तान की फारवर्ड पोस्टों पर तैनात पाकिस्तानी रेंजर सुरंग खोदकर घुसपैठ कराते हैं। क्योंकि इनको पूरी जानकारी होती है कि कहां पर खुदाई करने के लिए बेहतर जगह है। खुदाई का काम 20 से 25 दिन में पूरा किया जाता है।
यही कारण है कि पाकिस्तान सितंबर, अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर में इंटरनेशनल बार्डर पर सीज फायर का उल्लंघन कर गोलाबारी करता है, ताकि इसकी आड़ में घुसपैठ करा सके।
संभव है आतंकियों की घुसपैठ
जब भी सरहद पर सुरंग मिली है, तो उसके बाद एक बड़ा आतंकी हमला हुआ है। 2017 में सांबा में सुरंग मिली और तब नगरोटा में आतंकी हमला हुआ। इसके पहले 2016 में भी बार्डर पर सुरंग खोदी हुई मिली और इसके बाद हमला हुआ।
अब फिर से सुरंग खोदी गई है, संभव है आतंकी घुसपैठ कर चुके हों। सीमा पर धान बासमती अधिकतर लगाई जाती है, जिसकी लंबाई चार फुट के करीब रहती है। इसमें खुदाई का काम करना और फिर आगे निकलने में आसानी होती है।