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इंसानियत के लिए इमाम की कुर्बानी को किया याद

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पुंछ। शुक्रवार की दोपहर करीब 2.30 बजे पुंछ के मोहल्ला सराय स्थित तकिया पहलवान शाह में अंजुमन ए जाफरिया पुंछ के बैनर तले जुमे की नमाज के बाद शिया समुदाय की तरफ से मोहर्रम के दसवें दिन आशुरा का मातमी जुलूस निकाला गया। जुलूस के दौरान इमाम हुसैन और उनके साथ करबला के मैदान में मानवता के लिए शहीद होने वाले 72 बलिदानियों को याद करते हुए मातम किया गया। मातमी जुलूस में क्षेत्र के शिया समुदाय के हजारों की संख्या लोग शामिल हुए।
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जुलूस को संबोधित करने हुए शिया समुदाय के उत्तर प्रदेश से विशेष तौर पर बुलाए गए मौलाना खालिक मोसई ने कहा कि इमाम हुसैन द्वारा करबला के मैदान में दिए गए बलिदान में ऐसा क्या था कि 1400 साल बाद भी पूरी दुनियां उनको याद करते हुए उनका मातम मनाती है। ऐसा इसलिए है कि मानवता और इंसाफ की खातिर लड़े गए इस युद्ध में इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ बलिदान दिया। मोसई ने इसे दुनियां का सबसे श्रेष्ठ बलिदान बताते हुए कहा कि करबला में इमाम हुसैन अपने पूरे कुनबे, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं, तीन दिनों तक भूखे प्यासे रहते हुए कुर्बान हो गए थे, लेकिन यजीद के आगे हार नहीं मानी। इसीलिए आज भी पूरी दुनियां हुसैन को सजदा करती है। उनका मातम मनाती है। इस मौके पर अंजुमन ए जाफरिया संगठन के प्रधान मकबूल हुसैन कुली, शफीक हुसैन बाबा, अनवर हुसैन वांटू, किफायत हुसैन सोफी आदि मौजूद रहे। जुलूस के दौरान सामाजिक संगठन यशन के प्रधान इम्तियाज सलारिया की तरफ से पानी और खीर का नि:शुल्क स्टाल लगाया गया था।

मेंढर में जुलूस के दौरान रही कड़ी सुरक्षा
मेंढर। कसबे में भी 10वें मोहर्रम के अवसर पर शिया समुदाय की तरफ से मातमी जुलूस निकाल कर करबला की शहीदों को याद किया गया। जुलूस की दौरान इमाम हुसैन कि कुर्बानी और उनके साथ शहीद हुए लोगों को याद कर मातम किया गया। मातम के दौरान कई शिया युवाओं के शरीर से रक्त निकलता रहा, लेकिन वे अपने शरीर को पीटते ही रहे। इस अवसर पर प्रशासन द्वारा सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए थे। जुलूस के दौरान प्रशासन के कई बड़े अधिकारी मौजूद रहे। ब्यूरो
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