फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कश्मीर घाटी में हिंसा से दम तोड़ती हसरतों के 100 दिन

Sun, 16 Oct 2016 10:01 PM IST
रवींद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला/जम्मू
विज्ञापन
- फोटो : File Photo
विज्ञापन
ठहरी, सहमी और खौफजदा जिंदगी के 100 दिन। आतंकी तंजीमों और अलगाववादी मंसूबों ने इन 100 दिनों में कश्मीर को सालों पीछे धकेल दिया। अपनी तरह के सबसे भयावह इस शतक के हर दिन रियासत ने हसरतों को दम तोड़ते देखा है।
विज्ञापन


जिस कश्मीर से जुबिन मेहता की सुर लहरियां दुनियां के करोड़ों दर्शकों तक लाइव पहुंचीं थीं, जहां जब तक है जान, बजरंगी भाईजान और हैदर जैसी फिल्मों की शूटिंग ने बॉलीवुड का रुख फिर से जन्नत की ओर मोड़ दिया था, शाह फैसल ने प्रशासनिक सेवाओं में कामयाबी की नई इबारत लिखी थी, क्रिकेटर परवेज रसूल टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम में दाखिल हुए, उस कश्मीर में सौ दिन से सिर्फ तबाही की दास्तानें लिखी जा रहीं हैं। डल ने उदासी की चादर ओढ़ ली है। सड़कें सूनी, बाजार वीरान हैं।

सैलानियों ने तौबा कर ली है। बालीवुड भी दूर से ही हाथ जोड़ रहा है। सेब कारोबारी निराश हैं। स्कूल बंद हैं। विडंबना देखिए कि इन बंद स्कूलों के निदेशक वही शाह फैसल हैं जिन्होंने इसी दशक में इतिहास रचा। इसीलिए तो अपने आप को बंद स्कूलों का निदेशक कहकर अपना दर्द फेसबुक पर निकालने से खुद को रोक नहीं पाए। 
विज्ञापन

कई घरों में रोज चूल्हा जलना तक दुश्वार

- फोटो : File Photo
हर तरफ बारूद की गंध और पत्थरों का अंबार है। इस दरमियान सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हिंसा में 89 मौतें हुईं। हजारों जख्मी हुए। कईयों की आंख की रोशनी चली गई। अरबों का कारोबार चौपट हुआ। घरों में रोज चूल्हा जलना दुश्वार हो गया। बच्चों की पढ़ाई का बंटाधार हो गया।

सरकारी योजनाएं ठप। सचिवालय बंद। दफ्तर बंद। देश के इतिहास का सबसे लंबा रेलवे ब्रेकडाउन। ताजा इतिहास का सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाला कर्फ्यू। इन सबने कश्मीरी आवाम को जो दर्द दिए वे बेहिसाब हैं।

इन 100 दिनों में न तो नेताओं ने उनका दर्द बांटा, न उनके बच्चों को बहकाने वाले अलगाववादियों ने यह जानने की कोशिश की उनकी हरकतों ने कितनों के मुंह का निवाला छीन लिया है। आखिरकार आवाम को भी समझ में आया कि अपने बच्चों को विदेश भेजकर हर ऐशो-आराम मुहैया कराने वालों के मंसूबे क्या हैं। 
विज्ञापन

अब हिंसा से आज़िज आ गई कश्मीरी आवाम

- फोटो : File Photo
हमारी बेटियों को स्कूटी न छूने का फरमान जारी करने वालों की बीवियां बिकनी पहनकर फोटोशूट कराती हैं। आवाम के बच्चे उनके लिए महज खिलौने हैं। इनकी मौतों से उनका दिल नहीं लरजता। अब आम कश्मीरी आज़िज आ गया है।

उसे पता है कि आज अगर बच्चों को बहकने से नहीं रोका तो आने वाली तमाम नस्लें बरबाद हो जाएंगी। उनके लिए जरूरी यह है कि बच्चों की तालीम जारी रहे। उनकी बेटियों का भी बाहरी दुनिया से राफ्ता हो। घाटी में सैलानियों के रेले आएं ताकि उनकी माली हालत तसल्लीबख्श हो।

बालीवुड आए, उद्योग आएं, कारोबारी आएं। ट्रेनें भर-भरकर लोग जन्नत की धरती पर खिलखिलाने आएं। तभी केसर की क्यारियां महकेंगी, नरगिस मुस्कराएगी और वे भी वैसी ही जिंदगी जी सकेंगे जैसी हर हिंदुस्तानी जीता है। इसीलिए जगह-जगह अलगाववादी कैलेंडर को ठेंगा दिखाकर जिंदगी को पटरी पर लाने की मंशा असर दिखाने लगी है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें