भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर मंगलवार दिन भर बंदूकें शांत रहने से लोगों ने राहत की सांस ली है। हालांकि पिछले कुछ दिनों से हो रही गोलाबारी के कारण सुरक्षित स्थानों पर ले जाए गए ग्रामीण अब भी विस्थापित शिविरों में ही रहने को मजबूर है।
सीमांवर्ती गांवों में अभी सन्नाटा पसरा हुआ है। कई घरों में ताले लटके हुए है। गांवों में इक्का दुक्का ही ग्रामीण नजर आ रहे थे।
गांवों में नजर आए ग्रामीण भी वह थे जिन के घरों में मवेशी थे उन्हें चारा डालने के लिए ग्रामीण अपने गांव में गए थे शाम ढलने के उपरांत वह भी वापस विस्थापित शिविरों में पहुंच रहे थे।
गलाड कैंप के ग्रामीण जगीदश कुमार, नंद लाल, साहिल, प्रेम पाल आदि ने बताया कि उनका गांव सीमा के निकट होने पर पाक गोलाबारी का हमेशा ही शिकार रहा है।
उन्होंने कहा कि महिलाएं और बच्चे विस्थापित शिविरों में ही है। जबकि पुरुष मवेशियों को चारा देने के लिए आते है व शाम को वापस सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाते हैं।
यही हाल रिगाल, चचवाल, चलेआरी, मंगुचक एवं चक सददा के ग्रामीणों का है। घनी आबादी वाले गांवों की गलियां सूनी पड़ी हुई थी।
जिन गलियों में सारा दिन आवाजाही लगी रहती थी वहां पर ढूढे से भी कोई नही मिल रहा था। गोलाबारी के डर से गांवों को खाली कर दिया गया है।
ग्रामीणों का कहना था कि पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। कब गोलीबारी शुरू कर दे उन्हें हमेशा ही भय सा लगा रहता है।
यही वजह है की ग्रामीण डर के मारे गांवों में जाने से भी संकोच कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विस्थापित शिविर में ग्रामीण अखबार पढ़ कर पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली गोलाबारी के समाचारों पर नजर रख रहे हैं।