ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यालय में डाकू पंचम सिंह।
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मध्यप्रदेश के गांव सींगपुरा का रहने वाला वृद्ध पंचम सिंह कभी दुर्दांत डाकू था। करीब ढाई दशक तक चंबल क्षेत्र में उसके नाम से लोग थर्रा जाते थे। आज वह संत बन गया है। शांतिदूत बनकर लोगों को बदले की भावना से उबरने की सीख दे रहा है। ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यालय आश्रम द्वारा जेल में आयोजित कार्यक्रम ने पंचम सिंह के विचारों और जीवन को बिल्कुल उलट दिया। भिंड जिले के सींगपुरा निवासी पंचम सिंह कुछ दिनाें से उधमपुर के ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यायल आश्रम में रह रहे हैं।
उन्होंने बताया कि चौदह वर्ष की आयु में उनकी शादी हो गई थी। उसके बाद वह अपने माता-पिता के साथ खुशी-खुशी अपना जीवन जी रहे थे। इस बीच उनके गांव में पंचायती चुनाव के दौरान उनके साथ मारपीट की गई। बाद में भी उनके परिवार के साथ मारपीट जारी रही। इससे चलते प्रतिशोध की भावना ने उन्हें बागी बना दिया। फिर चंबल में रहने वाले डाकुओं के संपर्क में आए। तभी से शुरू हो गया आतंक की दुनियां। पूरी तरह से डाकू बनने के बाद वह कुछ लोगों के साथ अपने गांव पहुंचे।
वहां उन्होंने छह लोगों को मौत के घाट उतारा। उसके बाद यह सिलसिला जारी रहा। पंचम सिंह के मुताबिक 1958 से 1972 तक मध्य प्रदेश के 25 जिलों में उनका खासा खौफ था। बाद में कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर उन्होंने अन्य डाकुओं के साथ सामूहिक आत्मसमर्पण किया। 1972 से 1980 तक मुगाबली की खुली जेल में रहे। इस बीच 1976 से 1979 तक खुली जेल में ब्रह्मकुमारी विद्यालय द्वारा कार्यशाला का आयोजन किया गया था। उस दौरान पंचम सिंह का विचार और लक्ष्य बदल गया।
लूट के धन से किया समाज के लिए काम
डाकू से संत बने पंचम सिंह ने कहा कि जब वह डाकू थे तब भी गरीबों को कभी नहीं सताया। अन्याय करने वालों के खिलाफ लड़ते थे। गरीबों को तंग करने वाले सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा। इस दौरान लूटपाट किए गए पैसों से कई गांव में स्कूलों का निर्माण भी करवाया। लेकिन पुलिस की गिरफ्त में कभी नहीं आए। पुलिस ने उन पर दो करोड़ का इनाम भी रखा था।