उधमपुर के रठियान में कथा सुनाते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु
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उधमपुर। जटिल मन ही रोग है। और, जो रोगी है, वह सुखी कैसे हो सकता है? हमारे जीवन में उदासी, निराशा, हीनता, अवसाद, दुख, आदि समस्याओं की जड़ में ज्यादातर महत्वाकांक्षा ही होती है। उक्त बातें कथावाचक सुभाष शास्त्री ने रठियान पंचायत के खरूनी गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन मंगलवार को कहीं।
उन्होंने कहा कि महत्वाकांक्षी व्यक्ति इतनी ज्यादा इच्छाएं बना लेता है कि जब लक्ष्य प्राप्ति होती है तो वह यह भूल जाता है कि वह किसे प्राप्त करना चाह रहा था। जीवन में शांति और स्थिरता प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा की दौड़ में उसके जीवन का ढांचा इतना गड़बड़ा जाता है, कि उसे विश्रांति प्राप्त ही नहीं हो पाती। आवश्यकताएं सीधी व सरल होती हैं। कोई भी व्यक्ति बहुत सरल व सादा जीवन जी सकता है, और उससे आनंदित हो सकता है।
कथावाचक ने कहा कि मनुष्य के साथ मुश्किल यह है कि वह सोचता है, आनंदित होने के लिए पहले किन्हीं खास अवस्थाओं की पूर्ति आवश्यक है। असल में यही है अड़चन। यही होता है जटिल मन। सरल मन अनुभव करता है कि जो कुछ भी उपलब्ध है, उससे ही आनंदित होना है। आप भलीभांति समझ लो कि आवश्यकताएं स्वाभाविक होती हैं, और इच्छाएं अस्वाभाविक होती हैं। इच्छाओं को त्यागने वाला और आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला ही सरल और स्वस्थ मन कहलाता है।
अंत में उन्होंने संगत को समझाया कि इच्छाएं चेतन मन करता है। अनमोल मन की तो केवल आवश्यकताएं ही होती हैं। यह इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं, प्रतिस्पर्धाएं, यह सब आधुनिक काल की देन हैं। इनसे बचना चाहिए। तब ही दुखों से छूट पाएंगे।
उधमपुर के रठियान में कथा सुनाते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु- फोटो : UDHAMPUR