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Udhampur News: शिव-शक्ति का अनूठा मिलन... मां पार्वती को मायके से ले जाने के लिए आते हैं भोले बाबा

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उधमपुर। तीन दिवसीय मौंगरी मेला शिव-पार्वती के अनूठे मिलन की गाथा जीवंत करता है। मान्यता है कि यहां मां पार्वती अपने मायके लाडे-दियाड़े आती हैं और भोलेनाथ उन्हें लेने आते हैं। बुजुर्गों के अनुसार लाडे-दियाड़े (लाडली बेटी का घर) देवस्थान मां पार्वती का मायका माना जाता है। कहा जाता है कि विवाह के बाद जब मां पार्वती पहली बार मायके आईं तो भगवान शिव कैलाश ले जाने के लिए मोंगरी पधारे। शिव-पार्वती के मिलन की याद में हर साल ज्येष्ठ मास में मेला लगता है। पहले दिन बारात आगमन, दूसरे दिन देव मिलन व पूजा-अर्चना और तीसरे दिन विदाई की रस्म निभाई जाती है। शिव की बारात में देवी-देवताओं के चिह्न व निशान भी शामिल होते हैं। मेले का कोई लिखित इतिहास तो नहीं लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही मान्यताओं के अनुसार मेला 300 साल से भी ज्यादा पुराना है। पहले यह सिर्फ मोंगरी और आसपास के 12 गांवों तक सीमित था। अब उधमपुर, रियासी, रामबन और जम्मू तक से श्रद्धालु पहुंचते हैं। 1947 से पहले पशु मेला भी लगता था जहां दूरदराज से व्यापारी बैल और भेड़-बकरी खरीदने आते थे।
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सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक

मेले में डुग्गर की लोक गायकी भाख, गीतड़ू और करक गूंजते हैं। ढोल-नगाड़ों पर कुड नृत्य मुख्य आकर्षण रहता है। व्यंजनों में क्यूर, बबरू और अमबल के स्टॉल सजते हैं। निसंतान दंपति शिव-पार्वती से मन्नत मांगने आते हैं। मान्यता है कि मायके आई मां पार्वती खाली झोली नहीं लौटातीं। मेला हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। आसपास के मुस्लिम समुदाय के लोग लंगर व व्यवस्था में सहयोग करते हैं।

पहला सावन, जुदाई और स्वागत

कहते हैं कैलाश पर ब्याही मां गौरा को जब पहला सावन आया तो मायके की याद आई। मां मैना और पिता हिमाचल ने बेटी-जमाई को संदेश भेजा बेटी सावन में मायके जरूर आना। भोलेनाथ ने सहर्ष अनुमति दी। मां पार्वती अपने गणों के साथ मोंगरी आ गईं। आखिर सावन बीतने को आया तो भोलेनाथ खुद गौने लेने चल पड़े। जमाई राजा के आने की खबर पहुंची तो पूरा मोंगरी सज गया।
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तीन दिन रुके भोलेनाथ
लोक गाथा कहती है कि भोलेनाथ तीन दिन तक मायके में रुके। पहले दिन बारात चली। दूसरे दिन शिव-पार्वती मिलन हुआ। तीसरे दिन जब विदाई की बेला आई तो मां मैना की आंखें भर आईं। उन्होंने भोले से वचन लिया कि हर साल सावन में गौरा को मायके भेजना और लेने खुद आना।
स्वतंत्र देव कोतवाल ने 1998 में की थी खोज

शिव-पार्वती गुफा मंदिर में 9.5 फुट का स्वयंभू शिवलिंग है। ऐतिहासिक रूप से मौंगरी को पूजनीय कंसार देवता का निवास स्थान माना जाता है। उधमपुर के समाजसेवक स्वतंत्र देव कोतवाल की ओर से 14 सितंबर 1998 को गुफाओं व प्राचीन पत्थरों की खोज के बाद इसे आधिकारिक मान्यता मिली। 85 वर्षीय भगत राम कहते हैं कि हमने बड़े दादा से गाथा सुनी। मान्यता है कि जिस निसंतान जोड़े ने मेले में सच्चे मन से शिव-पार्वती के मिलन के दर्शन कर लिए उसकी गोद साल भर में भर जाती है।
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