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Udhampur News: सर्तिंगल गांव में बंजर भूमि पर गेंदे की खेती ने बदली महिलाओं की तकदीर

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गेंदे के खेत में काम करती महिलाएं। - फोटो : bhadrawah news
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भद्रवाह। भद्रवाह घाटी के सर्तिंगल गांव में व्यावसायिक फूलों की खेती महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास का नया माध्यम बनकर उभर रही है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के फ्लोरीकल्चर मिशन के तहत वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद-भारतीय समेकित चिकित्सा संस्थान (सीएसआईआर-आईआईआईएम) जम्मू के सहयोग से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़े महिला स्वयं सहायता समूहों ने बंजर भूमि पर गेंदे (अफ्रीकन गेंदा) की खेती शुरू कर सफलता की नई कहानी लिखी है।
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इस पहल से महिलाओं को आय अर्जित करने के नए अवसर मिलने के साथ-साथ उद्यमिता कौशल विकसित करने और कृषि क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर मिल रहा है। सर्तिंगल गांव की महिलाओं की यह पहल अब क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी व्यावसायिक फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

गांव में एनआरएलएम की क्लस्टर समन्वयक नादिया फारूक के नेतृत्व में महिला किसानों के एक समूह ने सीएसआईआर-आईआईआईएम के सहयोग से बंजर भूमि पर गेंदे की खेती शुरू की। शुरुआत में पांच महिलाओं ने प्रायोगिक तौर पर इस पहल में हिस्सा लिया था, लेकिन बेहतर परिणामों से उत्साहित होकर अब बड़ी संख्या में अन्य महिलाएं भी इससे जुड़ने के लिए आगे आ रही हैं।
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नादिया फारूक ने कहा कि वह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की आभारी हैं, जिसने महिलाओं को गेंदे की खेती शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया।

उन्होंने बताया कि हमारे क्लस्टर की पांच महिलाओं ने शुरुआत में परीक्षण के तौर पर गेंदे की खेती शुरू की थी। यह प्रयोग लाभदायक साबित हुआ और पिछले करीब डेढ़ महीने से हम जम्मू के आपूर्तिकर्ताओं को फूल बेच रहे हैं और अब तक 70 हजार से अधिक की आय अर्जित की गई है। इस सफलता से क्षेत्र की अन्य महिलाएं भी प्रेरित हुई हैं। अगले वर्ष गेंदे की खेती के लिए करीब 60 महिलाएं पहले ही अपना पंजीकरण करवा चुकी हैं।

महिलाओं के लिए आय और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता

सर्तिंगल गांव में महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं फूलों की खेती, तुड़ाई, पैकेजिंग और विपणन जैसे कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। इससे उन्हें अपनी आय अर्जित करने और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में मदद मिल रही है। साथ ही, कृषि संबंधी फैसलों में उनकी भागीदारी और आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।

इस पहल में गांव की युवा महिलाएं भी रुचि ले रही हैं। सर्तिंगल की 21 वर्षीय रिजवाना भद्रवाह कैंपस में साहित्य की पढ़ाई कर रही है, लेकिन पढ़ाई के साथ वह अपनी मां को फूलों की खेती में सहयोग देती हैं। रिजवाना ने कहा कि मैं भद्रवाह कैंपस में साहित्य की पढ़ाई कर रही हूं लेकिन मुझे अपनी मां के साथ खेती, फूलों की तुड़ाई और पैकेजिंग में हाथ बंटाना अच्छा लगता है। इससे मुझे खुशी मिलती है और यह मेरे लिए आय का अच्छा स्रोत भी बन गया है। इस काम में अपेक्षाकृत कम समय लगता है, इसलिए मैं अपनी पढ़ाई के साथ इसे आसानी से कर पाती हूं।

फूलों की खेती के साथ मूल्य संवर्धन पर भी जोर

सीएसआईआर-आईआईआईएम के फ्लोरीकल्चर मिशन के तहत किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों को उच्च गुणवत्ता वाली पौध सामग्री, आधुनिक ग्रीनहाउस तकनीकों और कृषि प्रौद्योगिकी का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को पारंपरिक खेती के साथ फूलों की व्यावसायिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना और उनकी आय के स्रोतों में विविधता लाना है।

मिशन के तहत ताजे फूलों की बिक्री के अतिरिक्त मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसमें आवश्यक तेल निकालना, अगरबत्ती बनाना और सूखे फूलों से विभिन्न उत्पाद तैयार करना शामिल है। इन गतिविधियों के जरिए महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने और उनकी आजीविका को अधिक टिकाऊ बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

चिनाब घाटी में कृषि आधारित रोजगार को बढ़ावा देने की पहल

पिछले पांच वर्षों के दौरान सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू ने किसानों में व्यावसायिक फूलों की खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उन्हें आवश्यक कौशल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह पहल आय विविधीकरण, रोजगार सृजन और ग्रामीण समृद्धि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
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-डॉ. शाहिद रसूल मियां, नोडल वैज्ञानिक, फ्लोरीकल्चर मिशन
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