- शोपियां के इस इलाके में 2003 में आतंकियों ने कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था
- कश्मीरी पंडित बोले, तब के और आज के हालात में जमीन-आसमान का अंतर
- मोदी सरकार रही तो हम फिर यहां आकर बसेंगे, मन तो बहुत करता है
मुजम्मिल याकूब
शोपियां। दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के नादिमर्ग गांव में हुए नरसंहार की सोमवार को 23वीं बरसी मनाई जाएगी। एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी। इस सभा में उन 24 कश्मीरी पंडितों को श्रद्धासुमन अर्पित किए जाएंगे जिन्हें आतंकियों ने 23 मार्च 2003 को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था। यह इस क्षेत्र के इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक है।
कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्य, स्थानीय निवासी, नागरिक समाज के सदस्य और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि सोमवार को स्मारक स्थल पर एकत्रित होंगे। इसके लिए तैयारियों को रविवार को अंतिम रूप दिया गया। मंदिर परिसर की साफ-सफाई की गई। समारोह के हर व्यवस्था का इंतजाम किया गया। इस अवसर पर अर्ध नरेश्वर मंदिर के अध्यक्ष भूषण लाल भट ने कहा कि पीड़ितों को सम्मान देने के लिए हर साल यह श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है। पहले यह समारोह जम्मू में आयोजित होता था लेकिन बुजुर्गों के मार्गदर्शन के बाद अब इसे नादिमर्ग में त्रासदी के वास्तविक स्थल पर ही आयोजित किया जाता है।
उस भयानक रात को याद करते हुए भट ने बताया कि लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादियों ने उस काली रात को करीब 11 बजे गांव में प्रवेश किया। कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से बाहर घसीटा। कीमती सामान लूटा और बाद में उन्हें एक कतार में खड़ा करके गोली मार दी। उन्होंने बताया कि यह लगातार तीसरा वर्ष है जब यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम नादिमर्ग में ही किया जा रहा है। भट ने कहा कि घटना के समय हम जम्मू में थे। हमें बीबीसी के माध्यम से इस नरसंहार के बारे में पता चला। जब हम यहां पहुंचे तो दृश्य दिल दहला देने वाले थे।
भट ने आगे कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में स्थिति में काफी सुधार हुआ है। स्थानीय समुदाय का भी समर्थन बढ़ रहा है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विस्थापित परिवारों के पूर्ण पुनर्वास के लिए सरकार और समाज दोनों के निरंतर सहयोग की आवश्यकता है। इस स्थल पर एक उचित स्मारक बनाने के प्रयास भी चल रहे हैं। यह जल्द ही पीड़ितों के लिए स्थायी श्रद्धांजलि के रूप में खड़ा होगा।
इस बीच नाला गांव के निवासी वीर जी भट ने भी अपनी दर्दनाक यादें साझा कीं। उन्होंने कहा कि हम यहां सोमवार को अपने परिवार के सदस्यों सहित उन 24 लोगों को श्रद्धांजलि देने आए हैं जिनकी हत्या कर दी गई थी। हम उन्हें अपनी ओर से सम्मानित करना चाहते हैं। हम यह भी उम्मीद करते हैं कि हमारे गांव को फिर से वैसा ही बनाया जाए जैसा वह पहले था। भाईचारे, सद्भाव और शांति से भरा हुआ।
त्रासदी को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्हें पहली बार इस नरसंहार के बारे में पता चला तब वे जम्मू में घर पर थे। उन्होंने कहा कि बाद में जब मैं घर का सामान लेने के लिए पास के एक कैंप में गया तो मैंने लोगों को इस घटना के बारे में बात करते हुए सुना। जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि क्या हुआ था। जब मैंने खबर पढ़ी तो मुझे पता चला कि मारे गए लोगों में मेरा भाई और उसकी बेटी भी शामिल थे। मैं तुरंत घर वापस भागा। माता-पिता को इस बारे में बताया। उस समय जो महसूस हुआ उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। ऐसा लगा मानो हमारी पूरी दुनिया ही थम गई हो।
हम यहां आकर बसना चाहते हैं, हमें व हमारे बच्चों को सब सुविधाएं मिलें
मौजूदा हालात पर बात करते हुए वीर जी भट ने कहा कि जहां अतीत डर और खामोशी से भरा था वहीं आज लोग कम से कम खुलकर अपनी बात कह पा रहे हैं। बिना खौफ घूम फिर सकते हैं। इसे वे एक सकारात्मक बदलाव के तौर पर देखते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार से लगातार मिल रहे सहयोग की बदौलत विस्थापित परिवारों का एक दिन पुनर्वास हो सकेगा। वे कश्मीर लौटकर एक बार फिर शांतिपूर्ण जीवन जी सकेंगे। भट ने कहा अगर मोदी सरकार रही तो हम फिर से यहां आकर बस सकेंगे। हम बसना चाहते हैं यहां आकर लेकिन चाहते हैं कि हमें और हमारे बच्चों को सब सुविधाएं मिले।