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लोक अदालत का फैसला बाध्यकारी, सहमति के बाद इसे चुनौती नहीं दी जा सकती : हाईकोर्ट

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अमर उजाला ब्यूरो
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने मंगलवार को चेक बाउंस के एक मामले में लोक अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए यह फैसला दिया कि जो पक्ष अपनी मर्जी से किसी समझौते में शामिल होता है, वह बाद में सिर्फ इसलिए उसे चुनौती नहीं दे सकता कि उसका पालन नहीं हुआ।
जस्टिस वसीम सादिक नरगल की बेंच ने आरए वानी की ओर से दायर एक याचिका को खारिज करते कहा कि पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर लोक अदालत द्वारा दिया गया फैसला अंतिम होता है, पक्षों पर बाध्यकारी होता है और इसे सिविल कोर्ट के आदेश (डिक्री) की तरह लागू किया जा सकता है। वानी ने 8 मार्च, 2025 के लोक अदालत के फैसले को और उसके बाद की उसे लागू करने की कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
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ऐसे किसी भी फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती। हालांकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपनी रिट अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए सीमित आधारों पर जैसे कि स्वतंत्र सहमति का अभाव, अधिकार-क्षेत्र में त्रुटि, या धोखाधड़ी इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। वानी की अर्जी के मुताबिक, यह विवाद सोपोर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था। यह शिकायत दो ऐसे चेकों से जुड़ी थी जो बाउंस हो गए थे। ये दोनों चेक वानी ने एएच डार के नाम पर जारी किए थे।
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वानी ने सुनवाई के दौरान अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली थी और बाद में लोक अदालत में इस मामले को सुलझाने पर राजी हो गए थे। समझौते के अनुसार उन्होंने मार्च 2025 तक पूरे और अंतिम निपटारे के तौर पर 3.8 लाख रुपये का भुगतान करने का वादा किया। हालांकि, समझौते का पालन करने में विफल रहने के बाद, निष्पादन की कार्यवाही शुरू की गई, जिसमें गिरफ्तारी वारंट जारी करने जैसे जबरदस्ती वाले कदम भी शामिल थे। इसके चलते वानी ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय का रुख किया।
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