अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। सीपीआईएम के वरिष्ठ नेता और विधायक मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने हाल ही में हुए इंडो-यूएस ट्रेड समझौते से जम्मू-कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर पर शुक्रवार को गहरी चिंता जताई। उन्होंने चेताया कि स्थानीय उत्पादक भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी आयातित सेब का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
तारिगामी ने कहा कि इस समझौते से अमेरिकन सेब, अखरोट और दूसरे कृषि उत्पादों की भारतीय बाजारों में ड्यूटी-फ्री एंट्री होगी जबकि भारतीय उत्पादों को यूएस में टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा, यह असल में अमेरिका के सामने सरेंडर करने जैसा है। इस डील से कश्मीर की फ्रूट इंडस्ट्री को खास तौर पर नुकसान होगा जो इस इलाके की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
उन्होंने बताया कि अमेरिकन सेब उगाने वालों को सरकार से काफी सब्सिडी मिलती है जबकि कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में उगाए जाने वाले सेब महंगे कीटनाशक और उर्वरक समेत ज्यादा लागत मूल्य से जूझते हैं। इसके अलावा उन्हें अक्सर सड़क बंद होने जैसी लॉजिस्टिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। तारिगामी ने कहा कि जम्मू और कश्मीर में नौकरी के बहुत कम मौके होने की वजह से खेती-बाड़ी का सेक्टर, खासकर बागवानी रोजी-रोटी के लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, सरकारी नौकरियां कम हैं, प्राइवेट सेक्टर कमजोर है। कालीन और शॉल जैसे पारंपरिक उद्योग अब हैं ही नहीं। टूरिज्म अभी भी कमजोर है।
सीपीआईएम नेता ने बताया कि कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाली ऑल इंडिया एप्पल फार्मर्स फेडरेशन को सरकारी दखल के लिए दबाव बनाने के लिए सक्रिय किया गया है। उन्होंने हाल की बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) लोन पर एक बार की राहत की मांग की। तारिगामी ने भारत की व्यापार नीति को अमेरिकी हुक्मों के साथ जोड़ने के लिए भी एग्रीमेंट की आलोचना की जिसमें रूस से तेल खरीदने पर रोक भी शामिल है और देश के स्वतंत्र ट्रेड फैसले लेने की क्षमता में कमी पर सवाल उठाया।