उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर से एक हाइब्रिड आतंकवादी से पहली बार मैग्नेटिक आईईडी (स्टिकी बम) की बरामदगी से यह बात पक्की हो गई है कि अब कश्मीर में आतंकी संगठनों के हाथों में यह घातक हथियार पहुंच चुका है। पहली बार सोपोर से मैग्नेटिक आईईडी के बरामदगी ने घाटी में तैनात सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। इसके बाद एजेंसियों के लिए चुनौतियां और भी बढ़ गई हैं। हालांकि पुलिस का कहना है कि जम्मू में फरवरी माह में स्टिकी बम के बरामद होने के बाद से ही कश्मीर पुलिस जोन ने इससे निपटने की रणनीति पहले से तैयार कर ली है।
एसएसपी सोपोर शब्बीर नवाब ने बताया कि मैग्नेटिक आईईडी की बरामदगी सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इस बम को हैंडल करना आसान है और आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने पर यह बहुत विनाशकारी हो सकता है। एसएसपी ने कहा कि मैग्नेटिक आईईडी छोटे और शक्तिशाली बम होते हैं जिन्हे वाहनों के साथ चिपकाए जाने पर उच्च विस्फोट प्रभाव होता है। लोगों को इस तरह के बम के बारे में पता होना चाहिए क्योंकि उन्हें आसानी से वाहनों में लगाया जा सकता है। नवाब ने बताया कि यह पहली बार है जब उत्तरी कश्मीर में इस तरह की आईईडी बरामद हुई है।
वहीं जम्मू कश्मीर पुलिस के एक आला अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि इन मैग्नेटिक आईईडी को बहुत खतरनाक माना जाता है क्योंकि इसने अफगानिस्तान में भारी तबाही मचाई थी जहां इसका इस्तेमाल टारगेट किलिंग के लिए किया गया था। हालांकि उन्होंने कहा कि कश्मीर में मैग्नेटिक आईईडी का आना कोई गंभीर बात नहीं है क्योंकि सुरक्षा बलों के पास पहले से ही मजबूत निगरानी तंत्र मौजूद है। उन्होंने कहा कि चुनौतियों को कम करने के लिए पिछले कुछ महीनों में कई बैठकें बुलाई गईं हैं।
अधिकारी ने कहा कि लक्षित हत्याओं में पिस्तौल का इस्तेमाल और मैग्नेटिक आईईडी का उपयोग उन प्रमुख चुनौतियों में से एक है जिनका वे सामना कर रहे हैं। अधिकारी ने बताया कि फरवरी के महीने में जम्मू संभाग में मैग्नेटिक आईईडी मिली थी। उस दौरान अमरनाथ यात्रा के दौरान बड़ी चुनौती रही, लेकिन इससे निपटने के लिए जमीनी स्तर पर हर प्रयास किए गए थे और व्यापक योजनाएं तैयार की गई थीं।
उन्होंने कहा कि हम लोग काफी हद तक यात्रा को सुचारू ढंग से करवाने में कामयाब रहे और आगे भी इस चुनौती से व्यापक ढंग से निपटने के लिए सक्षम हैं। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि मैग्नेटिक आईईडी को ज़्यादातर ड्रोन के जरिये जम्मू संभाग से जुड़े अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के पास गिराया जाता रहा है। अब इससे निपटने के लिए एंटी ड्रोन ग्रिड को भी मजबूत किया गया है।
क्या है मैग्नेटिक आईईडी
यह चुम्बकीय प्रभाव वाला बम है। इसे मेटल की सतह पर आसानी से चिपकाया जा सकता है। इसका ज्यादातर इस्तेमाल वाहनों पर लगाकर किया जाता है। आकार में छोटा होने के कारण इसे आसानी से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसमें टाइमर सेट होता है जिसका कनेक्शन रिमोट से होता है। रिमोट की मदद से दूर रहते हुए धमाका किया जा सकता है। इसे हैंड ग्रेनेड या एंटी टैंक नंबर.74 और एसटी ग्रेनेड के नाम से भी जाना जाता है जो काफी खतरनाक है।
कैसे होता है धमाका
इससे जुड़ी जो आतंकी घटनाएं सामने आई हैं, उनमें पता चला है कि इसका इस्तेमाल ज्यादातर वाहनों की टंकियों पर किया जाता है। पेट्रोल या डीजल टैंक पर इसे लगाया जाता है, ताकि धमाका और भी ज्यादा बड़ा हो। रिमोट का बटन प्रेस होते ही वाहन के परखच्चे उड़ जाते हैं। इसके लिए 5 से 10 मिनट के टाइमर का इस्तेमाल किया जाता है। इसका पता लगाने का कोई सटीक तरीका नहीं है, केवल अलर्ट रहकर और जांच करके ही इसे ढूंढा जा सकता है। इसका धमाका चारों दिशाओं में बराबर असर करता है। अफगानिस्तान ने तालिबान पर कब्जे से पहले कई बार स्टिकी बम का इस्तेमाल किया। इसके अलावा अफगानिस्तान में नाटो सेनाओं के खिलाफ भी इस मैग्नेटिक बम का काफी प्रयोग किया गया।
कब और कहां बनाया गया
इसे पहली बार 1940 में ब्रिटेन में बनाया गया। इसे स्टुअर्ट मैक्रे ने तैयार किया था। आमतौर पर इसका वजन 1 किलो होता है और लम्बाई 9 इंच तक हो सकती है। इस बम का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध में किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल अफगानिस्तान और इराक में हुआ।