कश्मीरियों की रक्षा पाकिस्तान कर रहा...संबंधी डॉ. फारूक अब्दुल्ला के बयान पर सियासी तूफान अभी थमा नहीं था कि पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के भी बिगड़े बोल फिर सामने आ गए। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय दिवस पर सोमवार को उन्होंने कहा, जबरन थोपी गई खामोशी अमन नहीं, आतंक है। देश के लोगों को कश्मीर का दर्द समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा इस खामोशी को अमन न समझे, यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। भाजपा ने इसका तीखा प्रतिकार किया और इसे वजूद को बचाने और सुर्खियों में बने रहने की महबूबा की एक कोशिश भर बताया।
पार्टी मुख्यालय में कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में महबूबा ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की भूमिका पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि 1947 में जब महाराजा हरि सिंह के विलय पत्र को शेख अब्दुल्ला ने जन-स्वीकृति दी थी, तब कश्मीरियों को भरोसा था कि भारत कोई कब्जा करने वाली ताकत नहीं है। इसके बाद 1953 के बाद शेख की ओर से 22 साल तक चलाए गए रायशुमारी यानी जनमत संग्रह के आंदोलन ने नई दिल्ली और कश्मीर के बीच अविश्वास की ऐसी गहरी खाई खोदी, जिसकी कीमत आज भी आम कश्मीरी चुका रहा है। इसी अविश्वास के चलते जम्मू-कश्मीर दुनिया का सबसे अत्यधिक सैन्यीकृत इलाका बन गया, जहां आज सात से आठ लाख सुरक्षा बल तैनात हैं। उन्होंने कहा कि भले ही शेख साहब ने 1975 के समझौते के बाद मुख्यधारा में वापसी कर ली लेकिन कश्मीरियों के माथे से अविश्वास का वह दाग नहीं मिटा।
चुनावी मुद्दा बना कश्मीर,अवाम की जुबान बंद
पीडीपी अध्यक्ष ने कहा कि 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा छीना गया। कश्मीर का नाम संयुक्त राष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश, पंजाब और हिमाचल के विधानसभा चुनावों तक सियासी फायदे के लिए उछाला जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि खुद कश्मीरियों की जुबान पूरी तरह बंद कर दी गई है। उन्होंने देश की जनता से कश्मीर का दर्द समझने की अपील करते हुए चेतावनी दी कि जो दमन घाटी में शुरू हुआ, वह अब धीरे-धीरे पूरे देश के संविधान और नागरिक अधिकारों तक पहुंच रहा है।
बंदूकों से जमीन पर कब्जा संभव, दिलों पर नहीं
फारूक के बयानों पर महबूबा ने कहा कि बदलते और दोहरे बयानों का जवाब फारूक को खुद देना होगा। कहा कि जमीन पर बंदूकों और फौजों के दम पर भूभाग पर तो नियंत्रण रखा जा सकता है, लेकिन लोगों के दिलों को कभी जीता नहीं जा सकता।
महबूबा मुफ्ती का बयान लगातार खत्म हो रहे अपने वजूद को बचाने और सुर्खियों में बने रहने की एक कोशिश भर है। कश्मीर का अवाम महबूबा के हथकंडों को समझ चुका है। उन्होंने युवाओं के हाथ में पत्थर देकर और कत्लोगारत के जरिये सरकार चलाई है। यही महबूबा हैं जो युवाओं से सवाल करती थीं कि तुम आर्मी के कैंप में टॉफी और दूध लेने जाते हो? सच तो यह है कि 370 और 35-ए हटने के बाद जम्मू-कश्मीर के हालात बदले हैं। -
डॉ. ताहिर चौधरी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा
नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। नेकां का भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर स्टैंड पहले से साफ है। नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों देशों के बीच वार्ता का समर्थन करती रही है, लेकिन पीडीपी का ऐसा कोई सरोकार नहीं है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने जो बयान दिया है वो अलग धारा प्रवाह को दिखाता है। उनके इस बयान को नेकां प्रमुख फारूक अब्दुल्ला के साथ जोड़ना गलत होगा। नेकां की राजनीति और तौर-तरीका साफ है।
-इमरान नबी डार, प्रवक्ता नेकां
जम्मू-कश्मीर के लोगों को हमेशा मलाल रहेगा कि उनसे रियासत का दर्जा केंद्र सरकार ने छीन लिया। महाराजा द्वारा जल, जंगल, जमीन, रोजगार सहित दिए गए तमाम अधिकारों से महरूम कर दिया गया। अवाम अपना दर्द बयां करना चाहती है और उनका माध्यम कांग्रेस ही बनेगी। भारत विरोधी बयान देकर सस्ती लोकप्रियता पाने और लोगों को गुमराह करने वाले कभी भी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं होंगे। जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट अंग है।
-रविंद्र शर्मा, मुख्य प्रवक्ता प्रदेश कांग्रेस