लद्दाख के कुलुम गांव में खाली पड़े मकान।
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लेह में एक दशक पूर्व तक अपर कुलुम गांव अपनी समृद्धि के लिए जाना जाता था। आज यहां कोई नहीं रहता। पानी के स्रोत सूखने पर गांव के सभी सात कुनबे पलायन कर उपशी गांव में बस गए। वर्ष 2012 से यह ऐतिहासिक गांव पूरी तरह से वीरान है, जिसे फिर आबाद करने की अनोखी पहल शुरू की गई है।
मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित और थ्री इडियट फिल्म में रेंचों किरदार की प्रेरणा सोनम वांगचुक स्वयंसेवकों के साथ खास परियोजना में जुट गए हैं। वर्ष 2023 के पर्यावरण दिवस तक इस गांव को फूलों की घाटी का रूप दिया जाएगा।
इस साल 5 जून पर्यावरण दिवस पर हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव के स्वयंसेवकों ने कृषि विभाग के सहयोग से गांव को फिर से आबाद करने की परियोजना शुरू की है। सोनम वांगचुक के अनुसार कुलुम गांव के लोग जलवायु शरणार्थी बन गए। उन्हें पानी के स्रोत सूखने पर दूसरे गांव जाकर बसना पड़ा। इस वीरान गांव में कृत्रिम ग्लेशियर (आइस स्तूप) से पानी की व्यवस्था की जा रही है।
कृषि विभाग के सहयोग से ड्रिप इरिगेशन सिस्टम (टपक सिंचाई) लगाया जा रहा है। स्वयंसेवक और सरकारी विभाग मिलकर अगले एक वर्ष में इसे फूलों की घाटी बनाने का लक्ष्य हासिल करेंगे। पानी का इंतजाम और बूंद-बूंद कर सिंचाई के पानी की व्यवस्था के साथ विभिन्न प्रजातियों के फूल लगाए जा रहे हैं। गांव को फूलों की घाटी के साथ उम्मीद का गांव बनाया जाएगा।
दुनिया देखेगी कैसे कुलुम में लौटा जीवन
सोनम वांगचुक ने कहा कि कुलुम को दुनिया के सामने एक नजीर बनाया जाएगा। यहां न सिर्फ खेतीबाड़ी और पलायन कर चुके कुनबों की वापसी करवाई जाएगी, बल्कि इसे ग्रामीण होमस्टे पर्यटन का नया केंद्र बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि कुलुम गांव जलवायु परिवर्तन को तो नहीं रोक सकता, लेकिन दुनिया के लिए प्रभावी संदेश जरूर बनेगा।