सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने खुद जमीन पर उतरे डीजीपी नलिन प्रभात, संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में सोमवार को मनाए जाने वाले शहीद दिवस के मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त रही। केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल (एलजी) प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुराने शहर (डाउन टाउन) के कई हिस्सों में कड़ी पाबंदियां लागू कर दी थीं।
शहर के नक्शबंद साहिब इलाके में स्थित मजार-ए-शोहदा की ओर जाने वाले तमाम रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया था। रविवार से ही कब्रिस्तान के एक किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया था। इसके बाद सोमवार सुबह पुराने शहर और सिविल लाइंस के कुछ इलाकों में एहतियात के तौर पर बैरिकेड्स, टीन की चादरें, खंभे और कटीले तारों की मजबूत घेराबंदी कर दी गई। संवेदनशील इलाकों में किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को भारी संख्या में तैनात किया गया।
घाटी में बने इस संवेदनशील माहौल और सुरक्षा तैयारियों की समीक्षा करने के लिए जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) नलिन प्रभात खुद जमीन पर उतरे। डीजीपी ने डाउनटाउन श्रीनगर का व्यापक दौरा कर सुरक्षा स्थिति और संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षाबलों की तैनाती का जायजा लिया। उनके साथ कश्मीर जोन के आईजीपी वीके बिरदी, सेंटर कश्मीर रेंज (सीकेआर) के डीआईजी राजीव पांडेय और एसएसपी श्रीनगर डॉ. जीवीएन संदीप समेत पुलिस के आला अधिकारी मौजूद रहे।
डीजीपी नलिन प्रभात ने नक्शबंद साहिब दरगाह के पास तैनात सुरक्षाकर्मियों से सीधे बातचीत की और सुरक्षा एजेंसियों की परिचालन तैयारियों की समीक्षा की। उन्होंने ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को हर समय सतर्क रहने और प्रभावी सुरक्षा प्रबंधन सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए ताकि शहर में शांति और सार्वजनिक व्यवस्था हर हाल में कायम रहे। प्रशासन द्वारा लगाई गई इन पाबंदियों का असर सुबह से ही दिखने लगा, जब नेताओं को शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाने से रोक दिया गया।
शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि वह सुबह साढ़े चार बजे जेकेएनसी महिला विंग की प्रांतीय अध्यक्ष सबिया कादरी के साथ मजार-ए-शोहदा जाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन कटीले तारों और भारी सुरक्षा घेरे के कारण सुरक्षाबलों ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि प्रशासन ने यह सख्त पाबंदियां पिछले साल के उस घटनाक्रम को दोहराने से रोकने के लिए लगाई हैं, जब पुलिस द्वारा मुख्य गेट पर ताला लगा दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुद दीवार फांदकर फातिहा पढ़ने अंदर चले गए थे।
पिछले साल डॉ. फारूक अब्दुल्ला ऑटो रिक्शा से और सकीना इत्तू स्कूटी पर बैठकर वहां पहुंची थीं, जिसके बाद पुलिस को गेट खोलना पड़ा था। इतिहास के पन्नों को देखें तो 13 जुलाई 1931 को श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर महाराजा हरि सिंह के सैनिकों की गोलीबारी में 22 प्रदर्शनकारी मारे गए थे, जिनकी याद में स्थानीय लोग इस दिन को शहीद दिवस के तौर पर मनाते हैं। पहले तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य में इस दिन आधिकारिक अवकाश होता था और सरकारी स्तर पर समारोह आयोजित किए जाते थे। हालांकि, अगस्त 2019 में राज्य के पुनर्गठन के बाद एलजी प्रशासन ने साल 2020 में इस दिन को सरकारी छुट्टियों की सूची से हटा दिया था।