श्रीनगर। कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट की हत्या के बाद से आंदोलनकारी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के 25 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को उप राज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात कर अपनी मांगें व समस्याएं रखीं। उन्होंने असुरक्षा की भावना बताते हुए जम्मू स्थानांतरण की एक सूत्री मांग दोहराई। उप राज्यपाल ने उन्हें आश्वस्त किया कि सरकार गंभीर है। उनकी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाएगा। सरकार उनके मुद्दों को हल करने के लिए हरसंभव प्रयास करेगी।
कश्मीरी पंडित कर्मचारियों से जुड़े संगठन के प्रवक्ता अविनाश भट ने मुलाकात के बाद पत्रकारों को बताया कि उन्होंने कश्मीर से जम्मू या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर फास्ट-ट्रैक आधार पर स्थानांतरित करने की मांग की है। उन्हें ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि हमारी केवल एक ही मुख्य मांग है कि हमें कश्मीर से जम्मू या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए। एलजी और प्रशासन के अधिकारियों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली जिन्होंने उन्हें हर संभव सहायता और मदद का आश्वासन दिया। उप राज्यपाल ने हमें आश्वासन दिया कि हमें एक सुरक्षित वातावरण, सुरक्षित आवास और सुरक्षित स्थान पर तैनाती दी जाएगी।
भट ने कहा कि उप राज्यपाल से कहा गया है कि जान है तो जहान है। वे पदोन्नति और आवास के लिए इंतजार कर सकते हैं क्योंकि मुख्य मांग कश्मीर से स्थानांतरित करने की है। हम कश्मीर में नहीं रहना चाहते हैं और हमें जम्मू या किसी अन्य स्थान पर तैनात किया जाना चाहिए। हमने एलजी से भी आग्रह किया कि हमें जम्मू में अपने परिवारों के साथ फिर से जुड़ने की अनुमति दें। इस पर आश्वस्त किया गया है कि कि वह अपने अधिकारियों की टीम के साथ इस पर विचार करेंगे। आने वाले दिनों में उप राज्यपाल के साथ और बैठकें हो सकती हैं। जब तक उनकी मुख्य मांग पूरी नहीं हो जाती, वे धरना समाप्त नहीं करेंगे।
सेव अस शीर्षक से सौंपा ज्ञापन
कश्मीरी पंडितों ने उप राज्यपाल को विस्तृत ज्ञापन भी दिया है। इसका शीर्षक था सेव अस। इसमें लिखा गया है कि हमें संवेदनशील और आसान शिकार के रूप में निशाना बनाया जा रहा है। घाटी में हर जगह छोटे-छोटे हथियार मौजूद हैं और सड़कों, दफ्तरों, बाजारों और घरों में हम पर गोलियां चलाई जा रही हैं। अल्पसंख्यक कहीं भी मारे जाने के भयानक दहशत में हैं। हमने एक साल की छोटी सी अवधि में कई लोगों की जान गंवाई है। हम फिर से 1990 के सबसे काले और दर्दनाक दौर की कल्पना से सिहर उठते हैं। हमें सार्वजनिक और सामाजिक मंचों पर कई धमकियां मिल रही हैं, जो या तो घाटी छोड़ने या मारे जाने की है। ज्ञापन में मारे गए कश्मीरी पंडितों की तस्वीरें और आतंकवादी संगठनों की धमकियां भी अटैच की गई थी।