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घाटी में कश्मीरियत को पुनर्जीवित करने के लिए बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों ने शुरू किए प्रयास

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श्रीनगर। आभासी दुनिया से निकल कर वास्तविक दुनिया में प्रवेश करते हुए बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों के एक समूह ने बैठक कर कश्मीरियत को पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू की। कश्मीरियत संघर्षग्रस्त घाटी में एकता और सांप्रदायिक सद्भाव की एक परंपरा है। इस समूह को समनबल के नाम से जाना जाता है। यह समूह एक नए सोशल मीडिया प्लेटफ ॉर्म पर शुरू किया गया था, जहां घाटी और विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों की आवाजें अक्सर कश्मीर में धार्मिक समन्वय की सदियों पुरानी संस्कृति को पुनर्जीवित करने के बारे में बातचीत करती हैं।
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इस समूह की शुरूआत बारामुला के जावेद डार ने रतनीपोरा के मैसर माजिद तथा कश्मीर विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डा. नुसरत अमीन के साथ मिल कर की थी। डार और माजिद राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं। अमीन उर्दू पढ़ाते हैं ।
विस्थापित समुदाय के प्रख्यात कलाकार इंदर सलीम ने कहा कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। पंडित और मुस्लिम एक ही परिवेश के हैं और राजनीतिक दुराव के बावजूद एक दूसरे के साथ संवाद करने की उनकी इच्छा है। दोनों समुदायों के बीच एक-दूसरे तक पहुंचने की नई गतिशीलता पैदा करने का आग्रह होगा। इंदर सलीम इस सम्मेलन में हिस्सा लेने दिल्ली से आए हैं। उनका नाम भी कश्मीरियत की भावना के अनुरूप है, जिसमें एक पंडित नाम है और एक मुस्लिम नाम है। प्रसिद्ध लेखक और टीवी शख्सियत मोहम्मद अमीन भट्ट ने कहा कि जब मैं अपने भाइयों से मिला तो मेरा जीवन चक्र पूरा हो गया। यह मेरे खुद के अलग-अलग हिस्सों का एक पुनर्मिलन था। इस दौरान भट्ट कई बार भावुक हुए।
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1990 में जो कुछ हुआ उसका दुख
डार एवं माजिद ने कहा कि 1990 में जो कुछ भी हुआ उसका उन्हें दुख है और इस समूह का निर्माण विस्थापित समुदाय को वापस लाने की दिशा में काम करने के लिए किया गया है। डार ने कहा कि हमलोगों को डा. नुसरत और कुछ अन्य लोगों से मार्गदर्शन मिलता है और आज हम इस बात से प्रसन्न हैं कि अंतत: आज हमारी मुलाकात प्रत्यक्ष रूप से हुई है। कार्यक्रम में वीडियो कांफ्रें स के जरिये शिरकत करते हुए डॉ नुसरत अमीन ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया प्लेटफ ॉर्म पर कहानी बनाई जा रही है कि 1990 के पलायन के लिए कश्मीरी मुस्लिम समुदाय जिम्मेदार था जिसने दोनों समुदायों के बीच दुश्मनी को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि इस समूह का उद्देश्य उन आवाजों को खोजना था जो कश्मीरी मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के बीच विभाजन को पाट सकें और मुझे खुशी है कि हमने इसे हासिल कर लिया है।
बैठक में आईएएस भी हुए शामिल
बैठक में शामिल आईएएस डा. शाहिद इकबाल चौधरी ने कहा कि आयोजकों का यह एक अच्छा प्रयास है और उनसे कई और आयोजन करने का आग्रह किया। इसमें अन्य क्षेत्रों के विभिन्न गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया ।
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