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Srinagar News: सेब के बागानों के पास 88% घरों में कीटनाशक से बचाव के लिए बफर जोन नहीं

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अध्ययन में हुआ खुलासा तीन-चौथाई आबादी पर कीटनाशकों के मध्यम से उच्च जोखिम का खतरा
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। कश्मीर घाटी में सेब के बागानों के आसपास रहने वाली आबादी पर कीटनाशकों का सीधा खतरा मंडरा रहा है। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि घाटी में सेब के बागानों के पास स्थित लगभग 88.8 प्रतिशत घरों में कीटनाशक के रसायनों बचाव के लिए कोई बफर जोन नहीं है, जिससे स्थानीय निवासी जहरीले रसायनों के सीधे संपर्क में आ रहे हैं।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल इम्पेक्ट में प्रकाशित इस अध्ययन में कश्मीर घाटी के सभी 10 जिलों के 509 घरों का सर्वेक्षण किया गया। अध्ययन के अनुसार, 41.06 प्रतिशत घर बागानों से 200 मीटर से भी कम दूरी पर स्थित हैं, जो कीटनाशकों के हवा के जरिए रिहाइशी इलाकों तक पहुंचने के जोखिम को काफी बढ़ा देता है। इसके अलावा, 70 प्रतिशत से अधिक परिवार कीटनाशकों के खाली डिब्बों व पैकेटों का बागानों के पास ही खुले में निपटान करते हैं, जबकि 45.38 प्रतिशत लोग इन जहरीले रसायनों को अपने रहने के कमरों में ही स्टोर करके रखते हैं।
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अध्ययन के रेजिडेंशियल प्रॉक्सिमिटी इंडेक्स (आरपीआई) के आधार पर पाया गया कि तीन-चौथाई (75%) से अधिक आबादी कीटनाशक संदूषण के मध्यम से उच्च जोखिम वाले दायरे में आती है। सर्वेक्षण में शामिल 55.01 प्रतिशत लोगों ने कीटनाशकों के छिड़काव के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का अनुभव होने की बात स्वीकार की, जबकि 61.30 प्रतिशत लोगों में इन रसायनों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर बहुत कम या सीमित जागरूकता थी। निदेशालय बागवानी के आंकड़ों के हवाले से अध्ययन में बताया गया कि जम्मू-कश्मीर में बागवानी भूमि का दायरा 1970-71 के 48,000 हेक्टेयर से बढ़कर 2022 में 2,12,000 हेक्टेयर हो चुका है। राज्य में इस्तेमाल होने वाले कुल कीटनाशकों का 83 प्रतिशत हिस्सा अकेले सेब के बागानों में इस्तेमाल होता है। घाटी में क्लोरपायरीफॉस, मैंकोजेब, कैप्टन, डिथेन, डाइमेथोएट और एंडोसल्फान जैसे रसायनों का बड़े पैमाने पर छिड़काव किया जाता है, जिनमें से कई कार्सिनोजेनिक (कैंसर का कारण बनने वाले) माने जाते हैं।
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मैदानी इलाकों के विपरीत कश्मीर के पहाड़ी भू-भाग के कारण बागान और मकान एक-दूसरे से सटे हुए हैं। शोधकर्ताओं ने इस स्थिति से निपटने के लिए आवासीय क्षेत्रों के आसपास घने पेड़-पौधों की ''वेजिटेटिव बफर जाेन'' दीवार बनाने, छिड़काव के बाद कुछ दिनों तक बागानों को ''नो एंट्री जोन'' घोषित करने और छिड़काव के दौरान खिड़की-दरवाजे बंद रखने की सिफारिश की है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इतनी बड़ी आबादी को स्थानांतरित करना संभव नहीं है, इसलिए बफर ज़ोन का निर्माण और सुरक्षित तरीकों का अपनाना ही तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।
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