कुपवाड़ा के करनाह-तंगधार सेक्टर के सीमावर्ती गबरा (नवांगबरा) गांव में मंगलवार की यह तस्वीर एक बलिदानी की बेटी के निकाह की है। बीएसएफ के जवान मोहम्मद रफीक रैना ने 2007 में शिलॉन्ग में देश की सेवा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनके जाने के बाद परिवार ने जिंदगी आगे बढ़ाई, लेकिन बेटी के जीवन के उस पड़ाव पर पिता की कमी फिर सामने आ खड़ी हुई, जहां हर बेटी अपने पिता का हाथ और आशीर्वाद चाहती है। इसी कमी के बीच मंगलवार को बीएसएफ की 31वीं बटालियन के अधिकारी और जवान परिवार के साथ खड़े नजर आए।
डिप्टी कमांडेंट मनवेंद्र सिंह और सेकंड-इन-कमांड अमरजीत सिंह की अगुवाई में बीएसएफ की टीम घर पहुंची। महिला कांस्टेबल भी टीम का हिस्सा थीं। जवानों ने शादी के इंतजामों में परिवार का हाथ बंटाया और पूरे आयोजन में अभिभावक की भूमिका निभाई। पंडाल से लेकर रोशनी और दूसरे जरूरी इंतजामों तक बीएसएफ ने सहयोग किया। दुल्हन के लिए सम्मान स्वरूप उपहार भी दिए। सबसे भावुक पल तब आया, जब बीएसएफ अधिकारियों ने मेहंदी रचे दुल्हन के हाथ पर अपना हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया। उस पल पिता की अनुपस्थिति जैसे कुछ देर के लिए पीछे छूट गई। बीएसएफ अधिकारियों ने दुल्हन से कहा कि पिता भले ही आज मौजूद नहीं हैं, लेकिन बीएसएफ का यह परिवार साथ खड़ा है। बेटी के लिए यह सिर्फ एक औपचारिक संदेश नहीं था। जिस घर में 2007 में वर्दी में लिपटा एक पिता हमेशा के लिए विदा हुआ था, उसी घर में वर्षों बाद उसी वर्दी ने बेटी की खुशियों में साथ निभाया।
उस दिन लगा था दुनिया खत्म हो गई
मोहम्मद रफीक रैना की पत्नी ने नम आंखों से बीएसएफ के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि 2007 में पति के जाने के बाद लगा था कि उनकी दुनिया खत्म हो गई। लेकिन बीएसएफ ने इतने वर्षों में परिवार को कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। बेटी की शादी के दिन जवानों और अधिकारियों ने जिस तरह साथ दिया, वह उनके लिए बेहद भावुक पल था।
गांव के नंबरदार मोहम्मद साजिद खान ने कहा कि बलिदानी की बेटी के सिर पर बीएसएफ ने जिस तरह हाथ रखा, वह सीमावर्ती इलाकों के लोगों और सुरक्षा बलों के बीच रिश्ते की तस्वीर पेश करता है। गांव के पूर्व सरपंच यासीन राथर ने भी बीएसएफ की भूमिका को सराहा।