श्रीनगर। दो दशकों से भी अधिक समय से रियासत में जारी आतंकवाद के दौरान जिन महिलाओं के पति लापता हो गए, उन्हें अब पुनर्विवाह की छूट मिल गई है। यह फरमान कश्मीरी बुद्धिजीवियों की ओर से गहन विचार-विमर्श के बाद जारी किया गया है। आतंकवाद की चक्की में पिस रही ऐसी महिलाओं को विवाह के लिए अब अपने पति की मृत्यु के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है। अंजुमन -ए- नुसरतउल इसलाम के मोहम्मद सईद उर रहमान कहना है कि इस संबंध में जल्द ही विस्तार से फतवा जारी किया जाएगा। एहसास नामक सिविल सोसायटी ग्रुप की पहल पर इस मुद्दे पर कर विचार-विमर्श शुरू हुआ था। इस फैसले का मानवाधिकार संगठनों ने भी स्वागत किया है।
आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित वे शादीशुदा औरतें हैं, जिनके पति के लापता हो गए। समाज तथा आतंक वाद के दो पाटों की चक्की में पिस रहीं ऐसी महिलाओं के लिए अपने पति के जीवित होने अथवा मरने की आधिकारिक सूचना जुटा पाना कठिन है।
यही उनके लिए सबसे अधिक परेशानी का सबब रहा। पति की मृत्यु हो जाने के संबंध में इनके पास कोई प्रमाणपत्र नहीं है। इतना ही नहीं रोजी-रोटी कमाने वालों को खो चुकीं, ऐसी महिलाओं के लिए अपने बच्चे को पालने में भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
अब इस्लामी वुद्धिजीवियों ने उनकी मुसीबतों को कम करने का रास्ता ढूंढ़ लिया है। इस्लामी बुद्धिजीवियों के समूह द्वारा दिए गए धार्मिक फैसले में कहा गया है कि अपने पति को खो चुकी कोई भी महिला यदि चाहे तो चार साल के बाद दूसरी शादी करने की हकदार है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस समय कश्मीर में 1500 के करीब ऐसी महिलाएं हैं, जिनके पति लापता हैं, लेकिन वे कहां हैं, इसके बारे में अधिकृत जानकारी किसी के पास नहीं है।