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20 साल से एक कमरे में चल रहा है प्राइमरी स्कूल

Sun, 01 May 2016 04:19 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/कठुआ
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स्कूल
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एक ओर राज्य सरकार सरकारी स्कूलों का दर्जा बढ़ाने के साथ साथ गुणात्मक शिक्षा पर बल दे रही है, जिसके लिए स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने पर जोर शोर से काम चलाने के दावे किए जाते हैं लेकिन पिछले लगभग बीस वर्षों से कठुआ से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर चल रहा मोबाइल प्राइमरी स्कूल (एमपीएस) तरफ तजवाल राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के सभी दावों की पोल खोलता है। 
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यूं तो यह मोबाइल प्राइमरी स्कूल है, लेकिन वर्ष 1994 के बाद राज्य भर के तमाम मोबाइल स्कूलों को स्थायी किए जाने के बाद से यह तरफ तजवाल में ही ठहरा हुआ है। दरअसल, राज्य सरकार द्वारा मोबाइल स्कूल गुज्जर और बक्करवाल समुदाय के खानाबदोश लोगों के बच्चों की शिक्षा के लिए खोले गए थे। 

वर्ष में दो बार पारंपरिक रूप से पलायन करने वाले इन लोगों के पलायन का सिलसिला तो आज भी जारी है लेकिन आतंकवाद के चरम पर रहने के दौरान इन मोबाइल स्कूलों पर ब्रेक लग गया। 
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खुले आसमान तले पेड़ की छांव में पढ़ने को मजबूर होना पड़ता

- फोटो : डेमो
इस स्कूल में 40 विद्यार्थी, दो शिक्षक और किराए का एक कमरा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि 1994 के बाद उक्त स्कूल ने भी डेरे के साथ पहाड़ों की ओर जाना बंद कर दिया। हैरानी की बात यह है कि बीस साल बीतने के बाद न तो स्कूल को इमारत मिली और न ही अन्य सुविधाएं। 

स्थिति इतनी दयनीय है कि जहां बच्चों को गर्मी और सर्दियों के दिनों में खुले आसमान तले पेड़ की छांव में पढ़ने को मजबूर होना पड़ता है, वहीं मिड डे मील के लिए किचन शेड तक उपलब्ध नहीं है। 

अमर उजाला की टीम ने शनिवार को जब स्कूल का दौरा किया तो पाया कि स्कूल के पास एक छोटे से किराए का कमरा ही उपलब्ध था, जिसमें न तो सभी बच्चे बैठ पाते हैं और न ही स्कूल का सामान आ पाता है। ऐसे में शिक्षक भी बच्चों की संख्या बढ़ने पर उन्हें खुले में ही पढ़ाते हैं। 

खास बात यह है कि उक्त स्कूल में अधिकतर बच्चे खानाबदोश परिवारों के हैं जिनके परिवार के सदस्य इस साल भी पहाड़ों की ओर रुख कर गए हैं और शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें यहां अपने रिश्तेदारों के पास छोड़ गए हैं।  
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