जम्मू कश्मीर में सीमा पार से घुसपैठ के बाद अब मच्छरों के हमलों का खतरा बढ़ गया है। संभाग के सीमावर्ती क्षेत्र पुंछ, डोडा और किश्तवाड़ में लीश मेनियासिस (त्वचा रोग) के मामले सामने आ रहे हैं।
इसमें सैंड फ्लाई नामक मच्छर संक्रमित व्यक्ति को काटने के बाद यदि किसी को काटता है तो दूसरे व्यक्ति भी संक्रमित हो जाते हैं। यानी एक मच्छर द्वारा लीश मेनियासिस का संक्रमण फैलता है।
एशियन देशों में इन मामलों से पाकिस्तान, अफगानिस्तान और साऊदी अरब ज्यादा प्रभावित हैं। देश में हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के अजमेर में लीश मेनियासिस के मामले प्रकाश में आते रहे हैं।
लेकिन रियासत में पिछले कुछ समय से ही ऐसे मामले पकड़ में आ रहे हैं। इन मामलों के सीमा पार से पहुंचने की आशंका है।
संभाग का किश्तवाड़ क्षेत्र हिमाचल बेल्ट से सटा है। इसी तरह पुंछ एलओसी पर बसा है। डोडा क्षेत्र भी सीमा से जुड़ा हुआ है। जीएमसी के त्वचा विभाग में नवंबर 2012 से अगस्त 2013 में हुए एक शोध में 118 मामलों में 46 में लीश मेनियासिस के संक्रमण मिलने की पुष्टि हुई है।
एसएमजीएस अस्पताल पहुंचे पीड़ितों पर ही यह शोध हुआ है। अभी तक शहरों से ऐसा कोई मामला रिपोर्ट नहीं हुआ है। त्वचा विभाग के एचओडी डॉ. देवराज डोगरा के अनुसार रियासत में पहले लीश मेनियासिस के मामले रिपोर्ट नहीं होते थे। लेकिन पिछले कुछ समय में यह मामले बढ़ रहे हैं।
कैसे होता संक्रमण और इलाज
लीश मेनियासिस त्वचा रोग के लिए जिम्मेदार मच्छर के किसी इंसान को काटने पर छोटा फोड़ा बन जाता है। जिसमें दो-तीन हफ्तों के भीतर फोड़ा जख्म की शक्ल में फैलता चला जाता है।
इस जख्म में सामान्य कोई भी एंटीबाडिज काम नहीं करती है, जिससे सामान्य डाक्टर की पकड़ में भी यह रोग नहीं आता है। पीड़ित को अस्पताल में बीस दिन भर्ती रखकर इलाज दिया जाता है।
इसमें सोडियम एंटी मेनिमम ग्लूकांट इंजेक्शन को प्रति एक किलोग्राम पर 10 मिलीग्राम के हिसाब से देना पड़ता है। पीड़ित की नियमित खून की जांच होती है। इसके लिए इंजेक्शन लोकल परचेज में जयपुर से मंगवाया जा रहा है।
संभाग में चलाया अभियान
मलेरिया, डेंगू और अन्य मच्छर जनित बीमारियों पर रोकथाम के लिए विभाग सतर्क है। मैदानी इलाकों के अलावा सीमांत क्षेत्रों में भी युद्ध स्तर पर दवाई का छिड़काव और फॉगिंग अभियान चलाया गया है।
डॉ. बलजीत सिंह,
स्वास्थ्य निदेशक जम्मू