कठुआ जिले में विशेष बच्चों को शिक्षा देने के लिए एक भी रिसोर्स टीचर नहीं है। जिला दो रिसोर्स रूम तो बनाए गए हैं, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों के न होने से यह योजना भी किसी काम की नहीं है। ऐसे में जिला के 745 बच्चे ऐसे हैं, जो कि सरकारी स्कूलों में दाखिला ले चुके हैं।
जिला में हर साल पहचान किए जाने वाले विशेष बच्चों के भविष्य को लेकर भी दुविधा है। शिक्षा विभाग द्वारा हर साल ऐसे बच्चों की पहचान की जाती है जिनमें से अधिकतर गरीब परिवार से होते हैं। ऐसे में आठवीं तक शिक्षा तो जैसे-तैसे हो जाती है लेकिन आठवीं कक्षा के बोर्ड में अधिकतर बच्चों के लिए दिक्कतें बढ़ जाती है।
या तो निचली कक्षा के बच्चों की मदद से परीक्षा में बैठते हैं या फिर सिर्फ आठवीं तक की शिक्षा की औपचारिता ही होती है। जिससे यह साफ हो जाता है कि शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों के प्रति आज भी गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।
शिक्षा मंत्रालय की ओर से हाल ही में जिला में 12 स्कूलों को अपग्रेड कर मॉडल स्कूल बनाए जाने की घोषणा की गई है।
ऐसे में विभागीय अधिकारियों की मानें तो इन मॉडल स्कूलों में एक रिसोर्स रूम का भी प्रावधान रखा गया है। लेकिन शिक्षकों के अभाव और उचित पहचान न होने के कारण एक बड़ा सवाल अभी भी विशेष बच्चों के भविष्य को लेकर संशय पैदा करता है।
एक ओर जहां राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा योजना के तहत जिला में बनाए गए दो रिसोर्स रूम शोपीस बने हैं तो क्या 12 नए रिसोर्स रूम बिना शिक्षकों के सिर्फ शोपीस ही साबित होंगे।