संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक मानी जाने वाली मां आशापूर्णी की महिमा निराली है। भक्तों के दुख हरने और सबकी मुरादें पूरी करने वाली मां आशापूर्णा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है। कठुआ के मुख्य बाजार स्थित दशकों पुराने मां आशापूर्णी के मंदिर में यूं तो हर मंगलवार भक्तों का तांता लगता है, लेकिन नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर माथा टेकने पहुंचते हैं।
मान्यता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। यहां माता आशापूर्णी पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर में बासी रोटी की प्रथा आज भी चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान उन्होंने मां आशापूर्णा का आह्वान कर बासी रोटी का व्रत रखा था। इससे उनकी मनोकामना पूरी हुई। आज भी यह रीत निभाई जाती है। लोग मनोकामना पूर्ति के लिए बासी रोटी का व्रत रखते हैं और बासी रोटी का प्रसाद बांटते हैं। मंदिर से जुड़ी एक अन्य दंत कथा के अनुसार भांड जाति के लोग आज भी मंदिर में माता को सौ मीटर से अधिक लंबी चुनरी नवरात्र के दौरान भेंट करते हैं। कठुआ शहर के बीच बाजार की संकरी गलियों में स्थित इस मंदिर का निर्माण 1947 के बाद पंडित छज्जू राम ने किया। उन्होंने मां की पिंडियों को स्थापित करने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। माता आशापूर्णी के मंदिर में शीतला माता की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।