कठुआ। आपसी भाईचारे और अमन का पैगाम लिए डुग्गर प्रदेश का एक और महत्वपूर्ण त्यौहार वीरवार को मनाया जाएगा। सुंदर मुंदरिए हो... तेरा कौन बेचारा, हो... दुल्ला भट्टी वाला हो... यह गीत लोहड़ी पर सुनने में मिलेंगे। रावी घाटी से लेकर चिनाब वैली तक डुग्गर के संस्कृति प्रधान क्षेत्र में लोहड़ी पर्व का अपना ही अनूठा महत्व है। पंजाब से सटा होने के चलते डुग्गर त्यौहारों में लोहड़ी को सबसे अधिक मान्यता वाला त्योहार माना जाता है।
बुधवार को लोहड़ी के लिए बाजारों में जमकर खरीदारी हुई। दुकानों के बाहर सजे स्टाल पर मूंगफली, गजक, रेवड़ी, चिवड़े, खजूर आदि की खरीदारी में बुजुर्गों के साथ युवाओं ने भी उत्साह दिखाया। कोरोना के खतरे के बीच लोगों ने बाजारों में एहतियात के साथ खरीदारी की। हर कोई लोहड़ी पर्व को मनाने के लिए उत्सुक नजर आया। पहाड़ों पर बर्फबारी के बाद शीतलहर की चपेट में गए कठुआ जिला में लोहड़ी त्योहार की परंपरा ने चार चांद लगा दिए हैं।
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दुल्ला डाकू कथा से भी जुड़ा है त्योहार
लोहड़ी को सर्दी के अंत की ओर बढ़ते समय का प्रतीक माना जाता है। रबी की फसलों की कटाई से भी इसे जोड़कर मनाया जाता है। इस समय खेतों में खेतों की फसल लहलहाती है। ऐसे में किसानों के लिए इस त्योहार का खास महत्व है। नवजात बच्चों, नव विवाहित जोड़ों की पहली लोहड़ी को भी डुग्गर प्रदेश में खास महत्व दिया जाता है। वैसे तो लोहड़ी पर्व के लिए कई दंत कथाए प्रचलित हैं। उनमें सबसे अधिक दुल्ला भट्टी डाकू की कथा को माना जाता है। दुल्ला भट्टी नाम का एक दयावान डाकू था, जो लाहौर से पेशावर तक जाने वाले सरकारी खजाने को हाफिजाबाद में लूटता था और उसका बढ़ा हिस्सा गरीब परिवार की लड़कियों की शादी में खर्च करता था। एक बार का किस्सा है अकबर हाफिजाबाद में एक फकीर भवन बुखारी के मकबरे की यात्रा पर था। इस दौरान उसने एक हिंदू लड़की को देखा और उसे अपने हरम में शामिल करने की सोची। लड़की के परिवार वाले दुल्ला डाकू के पास गए, तो उसने लड़की की शादी रात को ही हिंदू लड़के से करवा दी। तब से आज तक लोग उसकी प्रशंसा में गीत गाते हैं।
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भाईचारे और मित्रता का संदेश
डुग्गर प्रदेश की लोहड़ी सबसे खास है। साठ से सत्तर साल पहले लोहड़ी एक महीना पहले ही शुरू हो जाती थी, हालांकि अब ऐसा नहीं होता, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं है। आज भी युवा चाहे कम संख्या में ही सही टोली बनाकर लोहड़ी मांगते हैं। कोरोना ने भी त्यौहार पर कुछ असर डाला है लेकिन परंपरा को आज भी लोग पूरी तरह से निभाते हैं। लोग बाजरा, मक्की, चावल, धान आदि लोहड़ी के रूप में देंगे। लेन-देन की इस प्रक्रिया में आपसी भाईचारे और अमन का संदेश है।