वर्ष 2019 का बनी क्षेत्र के बाड़ी गांव का है मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी शिवानी अत्री ने 2019 के एक महिला के साथ मारपीट और छेड़छाड़ के मामले में पांच आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी किया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष पर आरोप साबित करने का दायित्व होता है और केवल संदेह के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। लिहाजा कोर्ट ने आरोपियों की जमानती व व्यक्तिगत बांड खारिज कर मामले का निपटान कर दिया।
कोर्ट में दायर चालान के अनुसार मामला 11 जुलाई 2019 का पहाड़ी क्षेत्र बनी के बाड़ी गांव का है। इसमें पीड़ित महिला मेमो देवी ने पुलिस थाना बनी में लिखित में शिकायत दर्ज करवाई गई थी। पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि एक आरोपी विनोद कुमार ने छेडछाड़ की थी जबकि अन्य आरोपी संजय कुमार, मंगलू देवी, प्रियंका देवी और शकुंतला देवी ने पीड़िता को लात-घूसों से मारपीट की थी। पीड़ित महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों ने उसके घर में घुसकर चल रहे निर्माण कार्य को रुकवाया और मिस्त्री की ओर से बनाई गई दीवार को भी तोड़ दिया था। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आरपीसी की धारा 452, 147, 323 के तहत मामला दर्ज किया गया, जबकि आरोपी विनोद कुमार के खिलाफ आरपीसी की धारा 452 के तहत अतिरिक्त अपराध जोड़ कर चालान को 2 सितंबर 2019 को कोर्ट में प्रस्तुत किया था। आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप 30 सितंबर 2019 को तय किए गए थे। इसमें सभी आरोपियों को खुद को निर्दोष बताया और अदालत से मुकदमा चलाए जाने का आग्रह किया गया। इसके बाद अभियोजन पक्ष ने आठ में से छह गवाहों की गवाही करवाई।
पीड़ित महिला ने कोर्ट में अपने बयान में आरोपियों के खिलाफ सभी आरोप को दोहराया, लेकिन मेडिकल अधिकारी ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई। प्रत्यक्षदर्शी एक गवाह अपने पहले बयान से मुकर गया और अभियोजन के पक्ष का समर्थन नहीं किया। उसने कहा कि आरोपियों ने केवल निर्माण कार्य रोकने को कहा था और कोई मारपीट नहीं की थी। पीड़ित की सास ने अदालत में कहा कि आरोपियों के हाथ में लाठियां थी लेकिन पुलिस ने मामले में कोई लाठी बरामद नहीं की थी। इसके अलावा जांच अधिकारी ने यह भी माना कि पड़ोसियों के बयान दर्ज नहीं किए गए थे, क्योंकि किसी ने घटना देखने की पुष्टि नहीं की थी। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों के बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड का अवलोकन कर पाया कि शिकायतकर्ता के बयान और मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर विरोधाभास और स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं करने पर बीते 27 फरवरी को आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया गया।