इंटरनेशनल लेवल पर पहचान बनाने वाली धोरों की नगरी जैसलमेर की 'रली' अब आॅनलाइन भी खरीद सकते है। रली के नए उत्पादों ने इसकी डिमांड भी बढ़ा दी है।
यह लोगों की पसंद में शुमार हो गई है। दरअसल, रली में पुराने कपड़ों को जोड़कर घर में उपयोग के लिए बैडशीट आदि बनाए जाते थे। अब ये साधारण नहीं रही है। रली का रूप अब डिजाइनर बैडशीट, सोफा सेट कवर व टेबल कवर ने ले लिया है।
वन विभाग के इंदिरा गांधी नहर परियोजना स्टेज द्वितीय के द्वारा जैसलमेर की रली को बेहतर पहचान दिलाने के लिए इसे काफी प्रयास किए गए हैं। अब यह प्रयास सफल होते भी प्रतीत हो रहे है।
कुछ समय पहले जर्मनी के टेक्सटाइल फेयर में रली को प्रदर्शित किया गया था। जहां 20 से अधिक देशों के व्यापारियों व लोगों ने रली को सराहा था और अच्छा रेस्पॉन्स दिया गया था। उनके अनुसार ख्यातनाम डिजाइनर्स ने रली के अलग अलग रूप तैयार करने की सलाह भी दी थी। जिसके चलते अब कई रूप में इसे तैयार किया गया है।
ऐसे बनती है रली
रली बनाती महिला कारीगर
- फोटो : Amar Ujala
जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्रों में घर घर में रली बनाने का चलन है। गांव की महिलाएं एक साथ बैठकर अपने अपने घर के पुराने कपड़ों के अलग अलग साइज में टुकड़े करने के बाद उन्हें आपस में जोड़कर रली बनाती है। यह रली गलीचे की तरह घर में बिछाने व बैडशीट की तरह बिछाने में काम में ली जाती है। वन विभाग की ओर से बनाए गए 5 स्वयं सहायता समूह रली बनाने के काम में जुटे हुए हैं। इन समूहों की रलियां जगह जगह प्रदर्शित की जा रही है।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना स्टेज द्वितीय के उप वन संरक्षक का कहना है की जर्मन के फेयर में कई कंपनियों के ऑर्डर आए थे। हालांकि उन्होंने इसमें सुधार की भी बात कही है। जैसलमेर की रली को अब आधुनिक रूप भी दिया जा रहा है।
आॅनलाइन मिलने से कारीगरों को मिलेगा बेहतर रोजगार
जैसलमेर की रली
- फोटो : Amar Ujala
जैसलमेर की रली को सरकार की ऑनलाइन वेब साइट ई बाजार पर भी बेचा जाएगा। जैसलमेर की हस्तकला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वन विभाग द्वारा यह पहल की गई है। इसके साथ ही अब विदेशों में पसंद होने के बाद अब ऑनलाइन बिक्री होने से देश भर के लोगों के लिए यह सुलभ उपलब्ध हो पाएगी।
पहले जहां मार्केटिंग के लिए कारीगरों को अन्य माध्यमों पर निर्भर होना पड़ता था लेकिन, अब ऑनलाइन बिक्री शुरु होने के साथ ही यह रली अन्य शहरों के रहवासियों को भी आसानी से मिल पाएगी। साथ ही हस्तकला के माहिर कारीगरों को भी बेहतर रोजगार उपलब्ध हो जाएगा।