हम आपको प्रदेश की कई ऐसी बेटियों के बारे में बताते हैं, जिन्होंने छोटी उम्र में की गई शादी को नकारकर प्रदेश में मिसाल पेश की। ये बेटियां किसी रॉल माडल से कम नहीं है।
अजमेर में इंजीनियरिंग कर रही 21 साल की कविता का बाल विवाह घर के बड़े—बुजुर्गों ने केवल ढाई साल की उम्र में कर दिया गया था। बालिग होने पर जब उसे अपनी छोटी उम्र में की गई शादी के बारे में पता चला तो उसने इसका विरोध किया। कोटपूतली के रहने वाले जिस लड़के से उसकी शादी की जा रही थी वह उससे बहुत कम पढ़ा लिखा था। इस पर कविता को लगा कि उसके इंजीनियर बनने के सपने टूट जाएंगे। शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन पंचायत और व्यक्तिगत भय इतना बढ़ गया कि कविता अवसाद में रहने लगी। इसी दौरान जोधपुर के सारथी ट्रस्ट की एक महिला कार्यकर्ता से उसकी मुलाकात हुई और उसने बाल विवाह का विरोध करते हुए पारिवारिक मामलों की अदालत में याचिका पेश की। इस पर अदालत ने याचिका को मंजूर करते हुए बाल विवाह को निरस्त करने का निर्णय किया और डिक्री पारित कर दी। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत बाल विवाह निरस्त कराने का यह अजमेर का संभवत: यह पहला मामला है।
व्हाट्स एप पर आए मैसेज से पसीजा जज का दिल
जोधपुर के नांदड़ी की रहने वाली मीनाक्षी विश्नोई ने भी अभी हाल ही खूब हिम्मत दिखाई। मीनाक्षी ने अपने बाल विवाह के खिलाफ जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास को व्हाट्सएप पर मैसेज कर मदद की गुहार की है। मैसेज में मीनाक्षी ने बताया है कि जब सात साल की थी तब उसका विवाह विष्णु की ढाणी निवासी भूताराम के साथ कर दिया गया था। अब मीनाक्षी बीएड कर रही है और शिक्षिका बनना चाहती है जबकि भूताराम ट्रक ड्राइवर है। भूताराम अब उसके घरवालों पर गौना करने का दबाव बना रहा है। इस पर मीनाक्षी ने अपना बाल विवाह निरस्त कराने के लिए न्यायाधीश गोपाल कृष्ण व्यास से मदद मांगी है। जस्टिस व्यास ने भी मीनाक्षी की मदद के लिए पिछले रविवार को ही विधिक सेवा प्राधिकरण का दफ्तर खुलवाकर कानूनी सहायता प्रारंभ करवा दी है। पिता निंबाराम विश्नोई का कहना है कि उनका न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है कि जल्द से जल्द उन्हें न्याय मिलेगा।
सरपंच बनकर जीत लिया दिल
जमवारामगढ़ की महंगी ग्राम पंचायत की सरपंच सुमन वर्मा ने भी ऐसा ही हौसला दिखाया। उन्होंने बताया कि सरपंच बनने से पहले बड़ी बहनों के साथ बचपन में शादी हो गई। इसके बाद आए दिन ससुराल में पति और सास दहेज को लेकर झगड़ा करने लगे। यहां तक कि आठवीं कक्षा में ही उन्होंने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी। इसके बाद भी यातनाएं कम नहीं हुई तो अपने मायके वापस आ गई। यहां आकर घरवालों ने ससुराल जाने का दबाव बनाया, लेकिन वे अपने निर्णय पर डटी रही। फिर से अपनी पढ़ाई शुरू की। इसी की बदौलत ग्रामीणों ने 2015 में उसे सरपंच के चुनावों में जीत दिलवाई। आज भी बाल विवाह के विरोध में हैं।
इन बेटियों ने संभाली एक दिन मंत्री पद की जिम्मेदारी
मंत्री के साथ जसोदा, सोना और प्रीती
- फोटो : amar ujala
टोंक जिले की रहने वाली है प्रीति राजावत। पेशे से शिक्षिका है, लेकिन पिता की तबीयत खराब रहती थी। लकवा होने के चलते पिता उनके सामने ही उसकी 15 साल की उम्र में ही शादी करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने लड़का भी ढूंढ लिया था। काफी मशक्कत के बाद उन्हें समझा—बुझाकर दिव्यांग श्रेणी का डिप्लोमा किया। इसके बाद घर में ही मूक—बधिर बच्चों को शिक्षित करने लगी। कुछ समय पहले ही गांव में चार बहनों की एकसाथ शादी करने की सूचना मिली। इनमें सबसे छोटी बहन करीब पांच साल की थी। पुलिस और प्रशासन को सूचना देकर मौके पर पहुंची। चारों बच्चियों का बाल विवाह रुकवाया और उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल भेजा।
अपना नहीं, लेकिन बड़ी होकर छोटी बहनों रोका बाल विवाह
टोंक के रामनगर ग्राम पंचायत की सोना बैरवा की बड़ी बहनों के साथ ही 6 साल की उम्र में शादी कर दी गई थी। लड़के की उम्र भी करीब 9—10 साल ही थी। बाल विवाह के बाद भी गांव में ही दसवीं तक पढ़ाई की। इसके बाद बड़ी क्लास का विद्यालय गांव में नहीं होने पर आवासीय विद्यालय में आगे की पढ़ाई की। इसी दौरान सुसराल वाले लेने के लिए आने का दबाव बनाने लगे। ये तक कह देते कि क्या पढ़ती ही रहेगी, घर गृहस्थी भी संभालनी पड़ती है। फिर भी ये सोचकर ससुराल चली गई कि वहां जाकर पढ़ लेगी, लेकिन पति ने कई बार बदतमीजी की। इसके बाद तो आए दिन झगड़े—मारपीट शुरू हो गए। इन सबसे तंग आकर माता—पिता को बताया और इस बात के लिए राजी किया कि अब ससुराल में नहीं रहना। बदनामी का भय दिखाकर परिवारवालों ने दबाव बनाया, लेकिन उसने नहीं मानी। गांव में आकर छोटी चार बहनों की भी छोटी उम्र में की जा रही शादियों को रोका। खुद ने जनवरी में तलाक ले लिया। आज सोना ने बीएड की शिक्षा ग्रहण कर ली है और शिक्षक बनने की तैयारी कर रही है।
जसोदा भी बनी मिसाल
राजसमंद के बागोल की रहने वाली जसोदा गमेती भी प्रदेश की बेटियों के लिए मिसाल बनी हुई है। परिजनों ने उसकी शादी छह साल की उम्र में ही कर दी थी। जब वह पन्द्रह साल की हुई, उसे ससुराल में भेज दिया गया। सुसराल में पति और ससुराल वालों के ताने सुनकर इस दलदल से बाहर निकलने का फैसला किया। इसी दौरान महिला मंच की सदस्यों से उसकी मुलाकात हुई। वजेराम गमेती की इस बेटी ने जाति के पंचों से लड़कर, फिर पति और ससुराल वालों का विरोध करके अपनी बचपन की शादी को गलत करार दिलवाया। इसके बाद जैसे ही जसोदा बालिग हुई उसने इस सम्बंध में न्यायालय में परिवाद दायर किया, जहां से कानूनन उसके बाल विवाह को निषेध घोषित किया गया।