राजस्थान हाईकोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के आदेश से श्रम आयुक्त की ओर से दी गई रिपोर्ट को चुनौती देने के मामले में उत्तर पश्चिम रेलवे पर एक लाख रुपए का हर्जाना लगाया है। अदालत ने कहा कि विभाग ने अदालती कार्रवाई को धोखा देने की कोशिश की है। रेलवे अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जिम्मेदार और कानून की पालना करें। इसके साथ ही अदालत ने रेलवे की याचिका को खारिज कर दिया।
न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश उत्तर- पश्चिम रेलवे के जीएम और डीआरएम की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिए।
अधिवक्ता प्रेमचंद देवन्दा ने बताया कि उच्चतम न्यायालय ने 2003 में ऑल इंडिया रेलवे पार्सल पोटर्स की याचिका पर उन्हें नियमित करने के संबंध में आदेश दिए। इस पर जयपुर के पार्सल पोटर्स ने उच्चतम न्यायालय में लंबित याचिका में नियमित करने के संबंध में प्रार्थना पत्र पेश किया। उच्चतम न्यायालय ने प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए 2013 में रेलवे के हर जोन में अधिकारी को नियुक्त कर काम कर रहे पोटर्स को नियमित करने के संबंध में निर्देश दिए। याचिकाकर्ता की ओर से नियुक्त अधिकारी ने नियमित काम नहीं होने का हवाला देते हुए पोटर्स को नियमित करने से इंकार कर दिया। इस पर पोटर्स ने पुन: उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। इस पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने लखनऊ श्रम आयुक्त को प्रार्थियों के अभ्यावेदन तय कर अपनी रिपोर्ट देने को कहा। आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में इन्हें नियमित करने की बात कही। इस रिपोर्ट को रेलवे ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि आयुक्त को यहां के पोटर्स पर निर्णय देने का क्षेत्राधिकार नहीं है। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने गत वर्ष 4 फरवरी को मामले में स्टे दे दिया। वहीं पोटर्स की ओर से जवाब पेश करने के बाद अदालत ने याचिका खारिज कर विभाग पर एक लाख रुपए का हर्जाना लगाया है।