धर्म परिवर्तन कर हिन्दू युवती पायल उर्फ आरिफा द्वारा निकाह करने के मामले मे राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई हुई।
जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास व जस्टिस मनोज गर्ग की खंडपीठ के समक्ष अप्रार्थी के अधिवक्ता की ओर से पेश किए जवाब पर वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर सिंघवी ने रिजोंइडर पेश किया। रिजोंइडर में बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में ही कहा है कि धर्म परिवर्तन मामलों में कानून बनाने का कार्य राज्य सरकार का है ना कि केन्द्र सरकार का।
सिंघवी ने बताया कि बुक एंड रजिस्ट्रेशन एक्ट 1867 सपठित संविधान के अनुच्छेद 77 के अर्न्तगत बने बिजनेस रूल्स के तहत केन्द्र सरकार ने विस्तृत दिशा निर्देश, सर्कुलर व फारमेट जारी किया है। जिसके अर्न्तगत नाम परिवर्तन, लिंग परिवर्तन, धर्म परिवर्तन आदि के सम्बंध में क्या प्रक्रिया होगी। जहां तक धर्म परिवर्तन का सवाल है केन्द्र सरकार ने एक फार्म बना रखा है, जिसके अन्तर्गत युवती को अपना वर्तमान धर्म त्यागना होता है। उसके पश्चात ही वह अन्य धर्म ग्रहण कर सकता है इसीलिए महज शपथ पत्र देने से कोई मुस्लिम बन जाए यह कानून गलत है।
वहीं सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवकुमार व्यास ने कहा कि सरकार ने धर्म परिवर्तन को लेकर बिल बनाया था, उसको दुबारा राष्ट्रपति के पास भेजा गया है। हाईकोर्ट ने अब इस मामले में आगे की बहस के लिए मामले की सुनवाई 27 नवम्बर को नियत की है।