राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के आपराधिक मामले में बरी होने के खिलाफ आपराधिक रिवीजन या अपील लंबित है तो इस आधार पर उसके नियमित सेवा परिलाभ को देने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत याचिकाकर्ता को ग्रेच्युटी राशि देने से इंकार कर दिया था। अदालत ने निगम को निर्देश दिए हैं कि वह याचिकाकर्ता को तीन माह में नौ फीसदी सहित बकाया राशि का भुगतान करें।
न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश सहायक अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए वीरेन्द्र कुमार सिंघल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता विद्युत निगम से वर्ष 2013 में सेवानिवृत्त हुआ था, लेकिन निगम ने उसकी ग्रेच्यूटी राशि को यह कहते हुए रोक लिया कि उसे एसीबी मामले में बरी किए जाने की अपील हाईकोर्ट में लंबित है।
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता को प्रकरण में अप्रैल 2004 में ही बरी किया जा चुका है। ऐसे में हाईकोर्ट में अपील लंबित होने के आधार पर सेवा परिलाभ नहीं रोके जा सकते। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने तीन माह में याचिकाकर्ता को ब्याज सहित बकाया भुगतान करने के आदेश दिए हैं।