दीक्षा लेकर सांसारिक जीवन का त्याग करना यह भरतीय परंपराओं में शामिल रहा है। एेसा ही कुछ यहां देखने को मिल रहा है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की रहने वाली अनामिका ने भौतिक सुख के साथ अपनी तीन वर्षीय मासूम बच्ची का भी त्याग कर दिया है।
अनामिका से साध्वी श्रीजी के रूप में नई पहचान से पूर्व उन्होंने सभी कानूनी अड़चनों को पार करते हुए हजारों लोगों की मौजूदगी में सूरत में दीक्षा ग्रहण की। अनामिका के पति भी इसी माह की 22 तारीख को दीक्षा ग्रहण कर सुमित मुनि बन चुके हैं।
हालांकि अनामिका को भी उसी दिन दीक्षा लेनी थी, लेकिन मासमू बच्ची को देखते हुए समाज व कानून की अड़चन के चलते वह दीक्षित नहीं हो सकी थी। लेकिन सोमवार सुबह करीब आठ बजे उन्होंने जैन आचार्य रामलाल से दीक्षा ग्रहण की।
सुबह केश लोचन और सफेद वस्त्र धारण के साथ सामायिक वाचन के साथ दीक्षा प्रक्रिया पूर्ण हुई। इस दौरान उनके पति रहे अब मुनि बन चुके सुमित भी उपस्थित रहे।