राजस्थान हाईकोर्ट ने रोडवेज कर्मचारी को 17 साल पहले दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने कर्मचारी को पुनरू सेवा में लेने का आदेश देते हुए इस अवधि का समस्त बकाया भुगतान करने को कहा है। न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश घासीलाल पारीक की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
याचिका में अधिवक्ता अंकुल गुप्ता ने बताया कि याचिकाकर्ता रोडवेज में कंडक्टर के तौर पर नियुक्ति हुआ था। वहीं बाद में उसे बुकिंग क्लर्क के पद पर लगाया गया। रोडवेज ने 25 मार्च सन् 2000 को याचिकाकर्ता को अपने स्टैंडिंग ऑर्डर, 1965 के प्रावधानों के अनुसार यह कहते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी कि उसकी 25 साल की सेवा पूरी हो गई है। ऐसे में रोडवेज के हितों में उसे अनिवार्य सेवानिवृत्त किया जाता है।
जिसे याचिका में कहते हुए चुनौती दी गई कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए नियमानुसार क्वालिफाइंग सर्विस काल की गणना ही की जाती है। ऐसे में याचिकाकर्ता की सेवा 23 साल 3 माह की है। इसलिए उसे स्टैंडिंग आर्डर के प्रावधानों के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्त नहीं किया जा सकता।
जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश को रद्द करते हुए उसे पुनरू सेवा में लेने के आदेश देते हुए समस्त बकाया अदा करने को कहा है।