भारतीय वैज्ञानिकों ने 15 साल की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार दुनिया को चौंकाने वाला जैव चिकित्सा उपकरण खोज निकाला है। बूचड़खाने में अक्सर कचरे में फेंके जाने वाले सूअर के पित्ताशय से वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक खोज निकाली जो इन्सानों के घाव बहुत जल्दी भर देगी। फिर चाहे वह घाव मधुमेह रोगी या फिर आग में झुलसने वालों का ही क्यों न हो। वैज्ञानिकों ने इस मैट्रिक्स का नाम कोलेडर्म रखा है।
इन्होंने की खोज
भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन त्रिवेंद्रम स्थित श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के प्रायोगिक विकृति विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. टीवी अनिल कुमार और उनकी टीम ने यह खोज की है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने इस तकनीक से बने जैव चिकित्सा उपकरण को क्लास डी श्रेणी में मान्यता दी है। अब जल्द ही एलिकॉर्न मेडिकल प्रा. लि. कंपनी इस उपकरण को बाजार में लाएगी।
दुनिया के लिए भारत बड़ा मंच
प्रो. टीवी अनिल कुमार ने कहा, लोगों को सुनकर भले ही थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन विज्ञान का काम ही कुछ और है। अभी तक अलग-अलग जानवर के अंगों से बनी कई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, भारत के लिए यह अभी एकदम नया है। सूअर पित्ताशय को लेकर अभी पूरी दुनिया के लिए भारत एक बड़ा मंच बन सकता है।
2004 में आया विचार, फिर शुरू हुई खोज
प्रो. कुमार ने बताया, साल 2004 में जब मैं एक खोज के सिलसिले में आयरलैंड गया, उस दौरान सूअर के पित्ताशय से घाव भरने को लेकर विचार आया। 2008 में मैंने अपनी टीम के साथ मिलकर त्वचा के घावों को जल्दी भरने के लिए तकनीक पर काम करना शुरू कर दिया जो आज मरीज से लेकर विज्ञान, बूचड़खाना, सूअर पालक और अर्थव्यवस्था तक सभी के हित में है।
मरीज का 80% खर्चा बचेगा
वैज्ञानिकों ने बताया कि मौजूदा समय में भारतीय बाजार में घाव भरने के इलाज में करीब 10 हजार रुपये तक खर्च आता है जो कोलेडर्म के जरिये अब दो हजार रुपये तक ही रह जाएगा। यानी एक मरीज का 80 फीसदी खर्चा कम होगा।
दूसरे देशों के पास नहीं है तकनीक
वैज्ञानिकों का कहना है कि कोलेडर्म बेहद सस्ती तकनीक है। पित्ताशय से बाह्य मैट्रिक्स को पुनर्प्राप्त करने की यह तकनीक दूसरे देशों के पास नहीं है। यह आगामी दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए उचित मौका दे सकती है।
पशु व्युत्पन्न उपकरणों पर धारणा गलत
बायो मेडिकल टेक्नोलॉजी के प्रमुख डॉ. हरिकृष्ण वर्मा ने कहा कि भारत में 2017 में चिकित्सा उपकरण संशोधित नियम लागू हुए। इन सख्त नियमों को लेकर हितधारकों के बीच आम धारणा है कि पशु-व्युत्पन्न चिकित्सा उपकरणों का विकास भारत में व्यावहारिक नहीं है, जबकि हमारी खोज एक मील का पत्थर है।