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वर्क फ्रॉम रिजार्ट: कोरोना के चलते वर्क फ्रॉम होम की नई शक्ल, बदला कामकाज का तरीका

Mon, 31 May 2021 10:43 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बड़े और मझोले पैकेज वालों ने ले ली अल्मोड़ा, नैनीताल, मनाली, शिमला की शरण।रिजाॅर्ट, होटल, कॉटेज से चल रहा है वर्क फ्रॉम होम, बड़े होटलों की बजाय ये स्थान पसंद आ रहे हैं।
 
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work from home - फोटो : pixabay
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विस्तार
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गोरखपुर के संजीव सिंह ने 20 अप्रैल को ही अल्मोड़ा में एक होटल में ठिकाना ढूंढ लिया और वहीं से वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। कोरोना के मामले काबू में आने के बाद वह ग्रेटर नोएडा आएंगे। वह जापान की प्रतिष्ठित कंपनी में काम करते हैं और उनका कहना है कि अल्मोड़ा में रहने के कारण कोविड उन्हें नहीं छू पाया। 

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संजीव से ही पता चला कि उनके कुछ मित्र मनाली में रॉक सी होटल में रुके हैं। रॉक सी होटल से पता चला कि इस होटल के प्रमोटर सचिन गुप्ता हैं। सचिन गुप्ता ने फरवरी, मार्च में ही कोरोना की आशंका को देखते हुए वर्क फ्रॉम होम के मॉडल पर काम करना शुरू कर दिया।

सचिन गुप्ता से संपर्क करने पर पता चला कि पिछले साल से ही वह रॉक सी में वर्क फ्रॉम होम के कांसेप्ट को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। पिछले साल भी कोरोना कॉल में उन्हें कोई खास दिक्कत नहीं हुई। सचिन बताते हैं कि देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले युवाओं की कमी नहीं हैं। इनमें से बड़ी संख्या में अविवाहित भी हैं। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान वर्क फ्रॉम होम की दिक्कतों को समझकर सही वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में सोचना शुरू किया। बताते हैं कि उनका यह प्रयास सफल रहा। जल्द ही मलानी के रॉक सी होटल में चंडीगढ़ और आस-पास के युवा भी परिवार सहित आ गए।
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कोरोना की दूसरी लहर में तो हिट रहा यह मॉडल
कोरोना की दूसरी लहर के प्रभाव में आने के बाद इस बार उनके होटल में बड़ी संख्या में युवा आए। इसे देखते हुए उन्हें आस-पास के होटल से भी टाई अप रखना पड़ा। नीतेश अवस्थी बताते हैं कि हम मनाली को सुरक्षित समझकर आए। मुझे लग रहा है कि हमारा यह फैसला सही था। 

नीतेश बताते हैं कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में उनके दो दोस्तों को भयानक परेशानी से गुजरना पड़ा। एक मित्र अब इस दुनिया में नहीं है। जबकि उनके इसी मित्र ने कोरोना जैसी आपदा के दौरान कुल्लू, मनाली, शिमला जैसे स्थान पर एकांत में जाकर रहने की सलाह दी थी। नीतेश बताते हैं कि उन्होंने तो मित्र की सलाह का पालन किया, लेकिन उनका मित्र दिल्ली के साऊथ एक्स में ही रुक गया।

23 अप्रैल को ही छोड़ दिया था एनसीआर
राहुल त्रिपाठी टेलीकॉम इंजीनियर हैं। वह भीमताल के पास रुके हैं। राहुल त्रिपाठी का कहना है कि कोरोना की पहली लहर में गांव करीब-करीब सुरक्षित रहे। उन्हें समझ में आ गया कि प्रकृति के पास रहने वाले लोग कोरोना के संक्रमण से बचे हुए हैं। इसे देखते हुए उन्होंने 23 अप्रैल को ही एनसीआर क्षेत्र छोड़ दिया था। 

भीमताल में बदली दिनचर्या
बच्चों के स्कूल भी बंद थे और पढ़ाई ऑनलाइन चल रही थी। लिहाजा उन्हें कोई झिझक नहीं हुई। भीमताल आकर उन्होंने यहां अपनी दिनचर्या तय कर ली। मार्निंग वॉक, योगा, अभ्यास करने के बाद वह वर्क फ्रॉम होम के तहत जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। अब उन्हें भी लग रहा है कि उनका यह निर्णय सही था। 

आउटिंग भी हो गई और सेहत भी ठीक रही
आईटी इंजीनियर राजेश चौधरी कहते हैं कि सच पूछिए तो यह निर्णय बुद्धिमानी भरा ही कहा जाएगा। चौधरी कहते हैं कि लॉकडाउन और कोरोना जैसा संक्रमण दिल्ली-एनसीआर, मुंबई या बंगलुरु में बिताने से यह प्रयोग कहीं अच्छा है। आउटिंग भी हो गई और स्वास्थ्य भी ठीक रहा।

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