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Israel: क्या अब इस्राइल की सीमा में ही खड़ा रहेगा अमेरिकी युद्धपोत! मुस्लिम देशों को सता रहा इस बात का डर

आशीष तिवारी
Updated Tue, 10 Oct 2023 03:06 PM IST

सार

इस्राइल पर फलस्तीन के आतंकी संगठन हमास की ओर से किए गए अब तक के सबसे बड़े हमले के बाद रूस और चीन की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दर्ज की गई है। ऐसे में सियासी जानकारों का कहना है कि अमेरिका का युद्धपोत इजरायल की ओर आना, रूस और चीन की चुप्पी के साथ अरब लीग का रूस के दरवाजे पर जाना सब कुछ सामान्य जैसा तो नहीं है।
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US navy warship - फोटो : ANI


दरअसल, इस्राइल पर फलस्तीन के आतंकी संगठन हमास की ओर से किए गए अब तक के सबसे बड़े हमले के बाद रूस और चीन की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दर्ज की गई है। ऐसे में सियासी जानकारों का कहना है कि अमेरिका का युद्धपोत इजरायल की ओर आना, रूस और चीन की चुप्पी के साथ अरब लीग का रूस के दरवाजे पर जाना सब कुछ सामान्य जैसा तो नहीं है। 


इस्राइल पर हमास के हमले के बाद जिस तरीके के हालात बने हैं, वह फिलहाल बिल्कुल सामान्य नहीं है। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि जो परिस्थितियां इस्राइल पर हमले के बाद मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में बनी है, उसमें सभी देश अपने-अपने नजरिए से मदद के साथ-साथ भौगोलिक दृष्टिकोण में नफा नुकसान का भी आकलन कर रहे हैं। इस पूरे मामले में रूस की ओर से की जाने वाली हमले की सामान्य प्रक्रिया भी अंतरराष्ट्रीय मसलों के जानकारों को कुछ और ही इशारा कर रही है। 


पूर्व राजनयिक और भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे आलोक सिन्हा कहते हैं कि जिस तरह से दुनिया के सभी ताकतवर देशों ने इस्राइल को अपना समर्थन देकर हमास की कमर तोड़ने और इस्राइल पर हुए हमले की निंदा की है, वह विश्व स्तर पर सराहनीय है। इस हमले की आड़ में अपने-अपने हितों के साथ इस्राइल की मदद को आगे आने वाले देश को लेकर विश्व पटल पर कई तरह की चर्चाएं भी हो रही हैं। जिसमें कहा तो यह तक जा रहा है कि यह संकेत किसी बड़े युद्ध के होने से पहले के मिल रहे हैं।


अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार डॉक्टर मधुसूदन कुरील कहते हैं कि मध्य और पश्चिम एशिया में हमेशा से पश्चिमी देशों का अपना अस्तित्व जमाने की एक उम्मीद हमेशा से अलग-अलग तरह से बंधी रहती है। ऐसे में अमेरिका की ओर से इसराइल को न सिर्फ मदद का आश्वासन देना, बल्कि तुरंत सैन्य सहायता के तौर पर अपने युद्धपोत को भेजना अमेरिका की एक सधी हुई रणनीति के साथ एक अपने मजबूत सहयोगी देश की मदद में साथ आने का बड़ा संदेश देता है। 


डॉक्टर कुरील कहते हैं कि अमेरिका समेत पश्चिमी देशों और अन्य ताकतवर मुल्कों के समर्थन के साथ इस्राइल को मिल रही मजबूती से अरब लीग भी अपने मुस्लिम ब्रदरहुड को आगे कर रूस के दरवाजे पर जा पहुंचा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार डॉक्टर अभिषेक सिंह कहते हैं कि यह बात बिल्कुल सच है कि जब हमास ने हमला कर समूचे माहौल को बिगाड़ दिया और ताकतवर देशों ने इस्राइल के साथ कंधे से कंधा मिला लिया, तो अरब लीग के मुस्लिम ब्रदरहुड कॉन्सेप्ट को मजबूती के साथ बड़े समर्थन की उम्मीद भी जाग गई है। 


डॉ. अभिषेक कहते हैं कि जिस तरीके से पश्चिमी देशों का समर्थन इसराइल को मजबूती के साथ मिल रहा है उससे मुस्लिम देशों को अब इस बात का डर भी सता रहा है कि कहीं इजरायल की सीमा में रहकर पश्चिमी मुल्क मुस्लिम देशों पर अपनी रणनीति के मुताबिक उनको अस्थिर करने का प्रयास न शुरू कर दें। वे कहते हैं कि इस पूरे मामले में यह देखना बेहद जरूरी है कि इस्राइल पर हमले के बाद पश्चिमी देशों के मिले मजबूत समर्थन के बाद भी रूस ने कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दर्ज की है। 
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वह कहते हैं कि इसके पीछे रूस की बहुत सधी हुई रणनीति शामिल है। उनका कहना है कि रूस को इस बात का भली-भांति अंदाजा है कि अगर वह पश्चिमी देशों के इस उकसावे में आकर इसराइल और हमास के मामले में अपना इंवॉल्वमेंट शुरू कर देगा तो उसकी पकड़ यूक्रेन में कमजोर हो जाएगी। डॉ. अभिषेक कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में खास तौर से वॉर जोन के दौरान अमूमन ऐसा देखा जाता है कि युद्ध करने वाले देश को दूसरे मामलों में भी फंसा कर उसको कमजोर करने की रणनीतियां भी अपनाई जाती हैं। रूस को इस बात का भलीभांति अंदाजा है। 


डॉक्टर अभिषेक कहते हैं कि इसी उम्मीद के साथ अरब लीग ने जब रूस के दरवाजे पर दस्तक दी तो उसके पीछे मंशा यही थी कि रूस अब इस मामले में दखल दे। लेकिन रूस ने अपनी सधी हुई प्रक्रिया के साथ किसी भी बड़े आश्वासन और मध्यस्थ के साथ यूक्रेन में अपनी पकड़ ढीली करने का इशारा नहीं किया।


ठीक इसी तरह चीन ने भी इस पूरे मामले में सिर्फ हमले की निंदा करके चुप्पी साध ली। पूर्व वरिष्ठ राजनयिक एचके सेन कहते हैं कि चीन की विदेश नीति रही है कि वह ऐसे मामलों में कभी भी खुलकर सपोर्ट नहीं करता है। सेन कहते हैं कि चीन अपने डिप्लोमेटिक रिश्तो को व्यापारिक नजरिए से सबसे पहले देखा है। उसके बाद वह अपने व्यापारिक रिश्तों के नफा नुकसान को अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डर और रूट का आकलन करके आगे की रणनीति तैयार करता है। इसीलिए इस पूरे मामले में इस्राइल पर हुए हमले का विरोध तो चीन ने किया लेकिन वह मुस्लिम देशों के समर्थन में उस तरह से सामने नहीं आया जिस तरह इस्राइल के पक्ष में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश आए हैं। 


एचके सेन कहते हैं कि बीते कुछ दिनों में जिस तरह से चीन का अरब देशों के साथ और अन्य मुस्लिम देशों के साथ रिश्ता बना हुआ है वह बिजनेस के नजरिए से बहुत मुफीद माना जा रहा है। इसलिए प्रतिक्रिया न व्यक्त करने के बावजूद भी चीन का समर्थन अरब लीग के साथ बना हुआ है।

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