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हरियाणा: भाजपा के साथ जो आया वह खत्म होने की कगार पर पहुंच गया, दुष्यंत चौटाला तोड़ पाएंगे मिथक?

Tue, 29 Oct 2019 08:10 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
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दुष्यंत चौटाला (फाइल फोटो) - फोटो : File
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हरियाणा में 40 सीट लेकर भाजपा के मनोहर लाल खट्टर दोबारा सीएम बन गए हैं और 10 सीट लेकर जननायक जनता पार्टी (जजपा) के दुष्यंत चौटाला ने डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाल ली है। अतीत को देखें तो भाजपा के साथ गठबंधन करने वाला दल, उसका समर्थन लेकर या देकर सरकार में आने वाली पार्टी बाद में खत्म होने की कगार पर पहुंच जाती है। राजनीतिक विश्लेषक भले ही इसे एक मिथक बताते हैं, लेकिन यह बात काफी हद तक सही भी है। 

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जब से दुष्यंत चौटाला, भाजपा को समर्थन देकर खट्टर सरकार में डिप्टी सीएम बने हैं, सोशल मीडिया पर यह मिथक जोर पकड़ता जा रहा है। इसके समर्थन में लोकदल, हविपा, हजकां और इनेलो जैसी राजनीतिक पार्टियों का नाम लिया जा रहा है। इन दलों में से पहले तीन खत्म हो चुके हैं, जबकि इनेलो खत्म होने की कगार पर जा पहुंची है। अब जजपा ने भाजपा को समर्थन दिया है। देखने वाली बात यह होगी कि दुष्यंत चौटाला इस मिथक को तोड़ पाते हैं या नहीं। सोशल मीडिया पर जो बातें हो रही हैं, उनमें 2019 जजपा + भाजपा =2024 खत्म...? लिखा जा रहा है। 

लोकदल और भाजपा जब साथ मिले तो लोकदल खत्म हो गया
हरियाणा में राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र कुमार कहते हैं, 1982 में देवीलाल के नेतृत्व वाले लोकदल और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि चुनाव के बाद जो राजनीतिक परिस्थितियां बनीं, उनमें छह सीटें जीतने वाली भाजपा ने अपने विधायकों की एक अलग बैठक बुलाई थी। दूसरी ओर लोकदल ने चौ. देवीलाल को अपना नेता चुना। इन दोनों पार्टियों की आपसी खींचतान जब बाहर निकलने लगी तो कांग्रेस ने सरकार बनाने का पासा फेंक दिया। 
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तत्कालीन राज्यपाल, जीडी तपासे ने चौ. भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया। उन्हें इस आधार पर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई कि 36 सीटों वाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। लोकदल और उसके सहयोगी दल भाजपा के दावों को नजरअंदाज कर दिया गया। इसके बाद 1987 में लोकदल-भाजपा गठबंधन को निर्णायक जनादेश मिला। लोकदल की 60 सीटें और उसके सहयोगियों, जिनमें भाजपा भी शामिल थी, को 16 सीटें मिलीं। 

इनके अलावा निर्दलीयों को मिलाकर कुल 85 सीटों के साथ लोकदल ने सरकार बनाई। यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1991 में कांग्रेस ने दोबारा से सत्ता में वापसी की। इसके बाद लोकदल भी खत्म होता चला गया। चौ. देवीलाल ने इंडियन नेशनल लोक दल यानी इनेलो का गठन कर लिया।  

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बंसीलाल की पार्टी 'हविपा' के साथ भाजपा का गठबंधन और हविपा खत्म

कांग्रेस की सत्ता के बाद हरियाणा में एक नया राजनीतिक गठबंधन देखने को मिला। 1996 में बंसीलाल ने कांग्रेस पार्टी से बगावत कर हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) का गठन कर दिया। हविपा ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और 33 सीटें जीतीं। भाजपा को 11 सीटें मिलीं। कुछ निर्दलीय विधायक भी थे। भाजपा और निर्दलीयों के समर्थन से बंसीलाल ने सरकार बना ली। तीन साल बाद ही यह सरकार टूट गई। 1999 में भाजपा ने हविपा के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया। कुछ समय बाद हविपा खत्म हो गई यानी इसका कांग्रेस में विलय हो गया। इसके बाद प्रदेश में फिर से एक राजनीतिक गठबंधन दिखाई दिया। 

साल 2000 में ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और भाजपा के बीच गठबंधन हुआ। चुनाव में इनेलो को अपने दम पर बहुमत मिल गया। नतीजा, चौटाला ने भाजपा की ओर ध्यान देना बंद कर दिया। आज उसी इनेलो को 90 में से केवल एक सीट मिली है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के बागी नेता कुलदीप बिश्नोई ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। कुलदीप की पार्टी का नाम हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) था। 

बिश्नोई को विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। हालांकि, लोकसभा चुनाव में हजकां अपने हिस्से की दोनों सीटें हार गई। कुछ समय बाद यह गठबंधन भी टूट गया। हजकां ने बाद में बीएसपी के साथ गठबंधन की घोषणा की थी, लेकिन यह भी अल्पकालिक था। मायावती ने कुलदीप को एक महीने के अंदर ही गठबंधन तोड़ दिया। इन सबका नतीजा यह रहा कि हजकां भी कांग्रेस में शामिल हो गई। यानी पार्टी का अस्तित्व खत्म। 

दुष्यंत चौटाला के लिए इस मिथक को तोड़ना एक चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश के डिप्टी सीएम बने दुष्यंत चौटाला के लिए इस मिथक को तोड़ना एक बड़ी चुनौती रहेगा। भाजपा और जजपा का गठबंधन क्यों और किन परिस्थितियों में हुआ है, यह बात सभी जानते हैं। दोनों पार्टियों का वोट बैंक अलग है, एजेंडा भी जुदा है और नेताओं की सोच तो किसी रूप में नहीं मिलती। यह किसी से छिपा नहीं है कि लोकदल से लेकर इनेलो और जजपा तक, इन पार्टियों का मुख्य वोट बैंक जाट समुदाय रहा है। ये पार्टियां इसी समुदाय के सहारे खुद को आगे बढ़ाती रही हैं। 

दूसरी ओर, भाजपा को गैर जाट वोटरों की पार्टी माना जाता है। इससे पहले भी जब कभी इन पार्टियों के गठबंधन हुए, गैर भाजपाई दल को उसका खामियाजा झेलना पड़ा। जजपा नेताओं की सोच है कि वह सरकार में शामिल होकर खुद को अच्छे तरीके से स्थापित कर सकती है। भाजपा की रणनीति यह हो सकती है कि वह दोबारा से खुद को गैर जाटों की ओर ले जाए। अगर दुष्यंत चौटाला जाट वोटरों को अपनी पार्टी से जोड़ते हैं तो उससे भाजपा को ज्यादा नुकसान नहीं होगा। हालांकि इस स्थिति में कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है। 

भाजपा की रणनीति भी यही है कि जाट वोट भले ही कम या ज्यादा हों, लेकिन वे विभाजित रहें। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यही हो रहा है। कांग्रेस पार्टी के नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा यह मानकर चल रहे हैं कि जाट वोटर उनके साथ हैं। उन्हें जो तीस सीट मिली हैं, उसमें जोट वोटरों का अहम योगदान है। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर गलती की है या फायदे का सौदा। देखने वाली बात यह भी होगी कि दुष्यंत चौटाला दशकों से चले आ रहे उस मिथक को तोड़ने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं। 
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