आजादी से बीस साल पहले पूना पैक्ट के जरिए अस्पृश्यता को खत्म करने का प्रयास हुआ। यह अलग बात है कि छूआछात जनगणना के बाद भी 90 साल तक चल रही है। आज देश में 15 से 16 फीसदी भारतवंशी ऐसे हैं, जो हिंदू, मुस्लिम, सिख व इसाई में 'अछूत' हैं, लेकिन उनकी पहचान नहीं है। आदिवासी भी 8 फीसदी हैं। 76 फीसदी जातिगत पहचान मंडल आयोग से हुई। इसके बाद अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण दे दिया गया। अंग्रेजों के समय में अल्पसंख्यक आरक्षण का आधार धर्म रहा। लोगों में खुद को अल्पसंख्यक दिखाने की होड़ लग गई। संख्या आधार पर गैर हिंदुओं की पहचान मिट गई। अंग्रेजी राज में जनगणना केवल हिंदुओं की हुई थी। मुसलमान और सिखों में भी जातियां होती हैं, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया। सरकार इसे नहीं मानती, लेकिन रोटी-बेटी के रिश्ते में वह प्रथा आज भी जिंदा है। सामाजिक जीवन में तो जन्म से ही जाति की पहचान हो जाती है, राजनीतिक भूमिका मिल जाती है। जाति की पहचान सरकारी कर्मी की मदद से सही होगी, इसमें संशय है। अंग्रेजी शासन में भी यह संभव नहीं हो पाया था। 90 साल में एससी-एसटी की जनगणना नहीं हो सकी। हर जाति को अपनी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक बेहतरी करने का अधिकार है। जब तक आरक्षण है तो जाति की जरुरत को अनदेखा नहीं कर सकते।
प्रो. आनंद कुमार बताते हैं कि इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो मालूम होगा कि जातिगत संरक्षण का एक कानूनी आधार रहा है। दबंगई और पुलिस कार्रवाई, ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। देश में पांच हजार से अधिक जातियां छूआछात का शिकार रही हैं। इसे परंपरागत छूआछात कहना ठीक रहेगा। आधुनिक समय में जब संविधान ने निर्देश दिया तो उनके साथ दूसरी जातियों में सरकारी मदद की लेने की होड़ मच गई। यही जाति का सच रहा है। इसे राजनीति का मायाजाल कह सकते हैं। जब तक आरक्षण रहेगा तो जाति की जरूरत को अनदेखा नहीं किया जाता सकता। अंग्रेजों ने जातिगत गणना को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। राजनीतिक समानता का सच, आर्थिक व धार्मिक समानता से टकराता है। जब किसी जनतंत्र में सामाजिक असमानता को दूर करने की इच्छा होती है तो उसे आरक्षण के तहत लाया जाता है।
1871 से 1920 तक सरकारी बाबूओं ने जाति की परिभाषा में संशोधन कर दिए। जाति प्रमाण पत्र के चक्कर में अवसरवादिता हावी हो गई। जातिप्रथा से पीड़ित लोगों की अनुसूचित जाति में शामिल होने की होड़ लगी। अछूतों के साथ यह हुआ कि वे एक प्रदेश में किसी जाति में तो दूसरे राज्य में अन्य जाति में शामिल हुए। दस करोड़ भारतीय ऐसे थे जो न तो स्वर्ण, न पिछड़े, न दलित और न आदिवासी की श्रेणी में आए। यह मनमाना विभाजन का नतीजा था। बाद में ऐसे लोगों को घुमंतू जाति का नाम दे दिया गया। राजनीतिक दलों को यह सोचना होगा कि जिस 'जाति, धर्म, भाषा' का विभाजन का दंश आज तक झेल रहे हैं, वह आगे न होने पाए। जाति, सरकारी मदद पाने का एक आधार न बने। अगर ऐसा होता है कि राष्ट्रीयता के साथ जातिगणना की टकराहट होती रहेगी। आजादी के बाद जब तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार पटेल के पास जातीय जनगणना का प्रस्ताव आया तो उन्होंने वह फाइल वापस लौटा दी थी। उनका कहना था कि जातीय जनगणना कराए जाने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है।