कैंडी में हिंसा की शुरुआत एक सिंहली ड्राइवर की मौत से हुई थी, जो सड़क दुर्घटना के बाद मुस्लिम युवकों से हुई लड़ाई में जख्मी हो गया था। लेकिन श्रीलंका के मुसलमान लंबे समय से निशाने पर रहे हैं। बौद्धों से पहले वे एलटीटीई के हमलों के भी शिकार होते रहे थे। श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त रहे एनएन झा बताते हैं, "एलटीटीई ने मुस्लिमों पर एक-दो बार हमला किया था और मस्जिद में नमाज पर पढ़ रहे लोगों को भी मारा था।''
वह कहते हैं कि यहां मुस्लिमों और बौद्धों के बीच भी काफी समय से तनाव बना हुआ था मगर पर्दे के पीछे था। वह बताते हैं, "
श्रीलंका में मुस्लिमों की आबादी वैसे तो कम है मगर पूर्वी हिस्से में उनकी तादाद ज्यादा है। अंपारे में उनकी संख्या अन्य धर्म के लोगों से ज्यादा है। बहुत साल पहले वे अपने लिए अलग प्रशासनिक जिला चाहते थे। सिंहली इस बात को भूले नहीं हैं। इस बात को लेकर तनाव रहा है मगर पर्दे के पीछे था।"
म्यांमार का असर श्रीलंका में
एनएन झा के मुताबिक म्यांमार में बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच तनाव का भी श्रीलंका में असर पड़ा है। वह बताते हैं, "जिस तरह म्यांमार में दो कट्टरपंथी बौद्ध नेताओं का प्रभाव है, उसी तर्ज पर श्रीलंका में भी बौद्धों का संगठन बना है जिसके नाम का अर्थ हुआ- बौद्ध सुरक्षा संघ। इसके नेता म्यांमार के
कट्टरपंथी बौद्ध नेताओं की ही तरह सक्रिय हैं।" दरअसल, श्रीलंका में 'बोदु बला सेना' या बीबीएस नाम का कट्टरपंथी बौद्ध संगठन है जो मुस्लिम विरोधी अभियान चलाने के लिए जाना जाता है।
इस संगठन के लोगों पर 2014 में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान माहौल खराब करने के आरोप लगे थे। एसडी मुनि कहते हैं कि इस तरह के संगठन हिंसा को भड़काने के लिए मौकों की ताक में रहते हैं। वह बताते हैं, "बौद्धों का वहां एक चरमपंथी संगठन है। जिस तरह से इस्लाम या हिंदू धर्म में कट्टरपंथी संगठन होते हैं, वे कुछ घटनाओं का फायदा उठाते हैं। चिंगारी दिखते ही वे फायदा उठाते हैं। जैसे कि कैंडी में सड़क हादसे से विवाद हुआ।
चिंगारी भड़कने के बाद आग लगाने के लिए यह संगठन आगे आता है और फिर आक्रामक भूमिका निभाता है।"
सरकार की भूमिका
श्रीलंका के संविधान में
बौद्ध धर्म को प्राथमिकता दी गई है और कहा गया है कि 'बुद्ध शासन' को बचाना और उसे बढ़ावा देना सरकार का कर्तव्य है। ऐसे में सांप्रदायिक हिंसा होने की स्थिति में श्रीलंका की सरकारों के तथाकथित ढीले रवैये पर भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। पहले से ही श्रीलंकाई सरकारें मानवाधिकार उल्लंघन के लिए भी पूरी दुनिया की आलोचना का सामना करती रही हैं। गृह युद्ध खत्म होने के बाद भी कुख्यात व्हाइट वैन्स (जिन पर नंबर प्लेट नहीं होती थी) में आम नागरिकों, पत्रकारों और सरकार विरोधियों के अपहरण होते रहे और फिर उनकी लाशें मिलती रहीं। मगर श्रीलंका की सरकारें मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों को सिरे खारिज करती रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि इस बार जब श्रीलंका में हालात खराब हो रहे थे, तब सरकार कहां थी? ऐसी नौबत कैसे आई कि इमरजेंसी लगानी पड़ी? एनएन झा बताते हैं कि मौजूदा सरकार अंदरूनी खींचतान के कारण कमजोर हो गई है। वह कहते हैं, "श्रीलंका की सरकार कमजोर हो गई है और उसे काम करने में दिक्कत हो रही है। राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे दोनों ही योग्य हैं मगर उनके बीच तारतम्य नहीं है। ऐसी जानकारी भी आ रही है कि प्रधानमंत्री से
गृह मंत्रालय भी ले लिया गया है और अब सिरीसेना किसी और को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं।" एनएन झा कहते हैं कि दंगे तो पहले भी होते थे, मगर अब सरकार थोड़ी कमजोर हुई है तो ऐसे समय में इस तरह के हालात पैदा होने के लिए अनुकूल माहौल मिल गया।
ध्रुवीकरण की राजनीति
श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे पर स्थानीय चुनावों के दौरान ध्रुवीकरण की राजनीति के आरोप लगे थे। श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त रहे झा बताते हैं, "लोकप्रियता के मामले में अभी भी महिंदा राजपक्षे भारी हैं। वह काफी समय तक राष्ट्रपति रहे हैं और अब तो स्थानीय चुनावों में उनके समर्थित दल की जीत भी हुई है। ऐसा भी कहा जा रहा था कि सरकार को बदनाम करने के लिए हिंसा भड़काई जा रही है।" 2009 में एलटीटीई को खत्म करने के बाद और तमिल विद्रोहियों पर जीत हासिल करने के बाद मानवाधिकार उल्लंघन के लिए महिंदा राजपक्षे की पूरी दुनिया में आलोचना हुई, मगर वह सिंहली समुदाय के हीरो बन गए थे।
बावजूद इसके पिछले चुनाव से पहले उन पर भ्रष्टाचार और तानाशाही रवैये के आरोप लगने के बाद उनकी हार हो गई। लेकिन अब एक बार फिर स्थानीय चुनावों में राजपक्षे के समर्थन वाली पार्टी की भारी जीत हुई है। इसे राजपक्षे की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। राजपक्षे को उन ग्रामीण
सिंहलियों का समर्थन प्राप्त है जो मानते हैं कि सिरिसेना सरकार मुस्लिमों और तमिलों के प्रति नरम रवैया रखती है। वह खुद भी तमिलों को ज्यादा अधिकार देने के खिलाफ हैं।
एसडी मुनि मानते हैं कि इस तरह की घटनाओं के पीछे राजनीति का भी खेल है। वह कहते हैं, "राजपक्षे समर्थित पार्टी स्थानीय चुनावों में जीती है। राजपक्षे का कहना है अगर आप तमिलों को नए संविधान में ज्यादा अधिकार देंगे तो एलटीटीई की वापसी हो सकती है। इस कारण सिरीसेना की सरकार का भी राजपक्षे भारी विरोध करते हैं। साथ ही जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय 2009 में हुई भीषण हिंसा पर जवाबदेही मांगता है तो राजपक्षे चाहते हैं कि श्रीलंका इससे इनकार करे क्योंकि इसमें राजपक्षे के भाई और सैनिक नेतृत्व के लोग फंसेंगे। वह नहीं चाहेंगे कि इन बातों को आगे लाया जाए। राजनीति के पीछे जातिगत प्रश्न होते ही हैं। राजनेता जाति का फायदा उठाते हैं।"
बढ़ती कट्टरता
सरकार के कमजोर होने के साथ-साथ बढ़ती कट्टरता भी श्रीलंका के लिए परेशानियां पैदा कर रही है और ये कट्टरपंथ किसी एक समुदाय के लोगों तक सीमित नहीं है। एसडी मुनि कहते हैं कि पूरी दुनिया, खासकर दक्षिण एशिया के माहौल में धार्मिक
कट्टरपंथ की बड़ी भूमिका है। वह कहते हैं, "मुसलमान समुदाय फोकस में है। इस्लामिक जिहाद भी उसका कारण है। इस कारण अन्य समुदाय भी कट्टर हो रहे हैं। बौद्ध धर्म में भी चरमपंथी रहे हैं- कोरिया, जापान से लेकर श्रीलंका के पुराने उदाहरण भी हैं। अतिवादी ग्रुप इन संगठनों में थे और वे हटे नहीं है। समय के साथ वे संगठित हुए हैं। उनकी राजनीति में बड़ी हिस्सेदारी है और आर्थिक रूप से भी जुड़े हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं बढ़ेंगी।"
जानकार मानते हैं कि श्रीलंका की मौजूदा सिरीसेना सरकार ने जातीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रस्ताव तो रखे हैं मगर उन्हें वह पूरा नहीं कर पाई है। ऐसे में तमिलों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही तो सिंहली मानते हैं कि तमिलों और मुसलमानों के प्रति सरकार कुछ ज्यादा ही नरम है। कुल मिलाकर देखें तो सरकार के अंदर की खींचतान और बदलते राजनीतिक माहौल के बीच विभिन्न समूहों में बढ़ता असंतोष और कट्टरपंथ शांति की राह में चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।