अटल जी उस वाकये का जिक्र 1996 में पुणे में आयोजित सावरकर जयंती के एक कार्यक्रम में बड़े ही रोचक ढ़ंग से बताई। अटल जी ने कहा, अफगानिस्तान के अपने मेजबानों से मैंने कहा, मैं गजनी जाना चाहता हूं। पहले मेरी बात उनकी समझ में नहीं आई। कहने लगे, गजनी तो कई टूरिस्ट स्पॉट नहीं है। मैं उन्हें पूरी बात नहीं बता सकता था। मेरे हृदय में गजनी कहीं कांटे की तरह चुभ रहा है। जब से मैंने गजनी से आए एक लुटेरे की कथा पढ़ी है, मैं देखना चाहता था कि वो गजनी कैसा है।
वह यह भी बताना नहीं भूले कि गजनी की कथा उन्होंने बालकाल में पढ़ी थी, तभी से गजनी उनके हृदय में चुभ रहा है। बचपन से ही अटल ये जानना चाहते थे कि जिस गजनवी ने सोमनाथ मंदिर लूटा, जिसे देश में कोई टक्कर नहीं दे पाया आखिर वो जिस गजनी से आया वो जगह कैसी है। जहां से एक लुटेरा लुटेरों की फौज लेकर आया और सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को खूब लूटा।
अपने ही अंदाज में अटलजी कह रहे हैं कि अफगानिस्तान में गजनी का आज भी कोई अस्तित्व नहीं है। और अगर सैकड़ो साल पहले ही बात करें तो एक छोटा सा गांव भर था। ये लुटेरों का गांव था। यहीं मोहम्मद गजनवी पैदा हुआ। उसने कई लुटेरों को अपने गिरोह में शामिल किया और हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया और गुजरात के सोमनाथ में खूब उत्पात मचाया। उसने भारत को 17 बार लूटा और सबसे ज्यादा उत्पात उसने सौराष्ट्र में सोमनाथ मंदिर में मचाया।
अटल बिहारी वाजपेयी दूरद्रष्टा तो थे ही वहीं वह अपने भाषण के द्वारा इशारों में भी धर्म और जात-पात पर करारा प्रहार कर देते थे। ऐसा ही एक बार उन्होंने पलासी के युद्ध का जिक्र करते हुए किया। वह कहते हैं कि पलासी के युद्ध में जितने योद्धा मैदान में लड़ रहे थे उससे कहीं ज्यादा लोग मैदान के बाहर तमाशा देख रहे थे। वह यह जानने में उत्सुक थे कि आखिर युद्ध का परिणाम क्या निकला।
गुस्से की बानगी देखिए वह आगे कहते हैं कि देश के भाग्य का निर्णय होने जा रहा था लेकिन उस निर्णय में पूरा देश शामिल नहीं था। बातों बातों में उन्होंने कहा कि हमने अपने देश को कैसे बांट रखा है, युद्ध के मैदान में सिर्फ क्षत्रीय जाएगा वही देश के लिए लड़ेगा, हम कैसा देश बना रहे हैं। फिर वह गजनी पर वापस लौटते हैं और कहते हैं कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अफगानिस्तान में गजनी के लिए कोई स्थान नहीं है लेकिन वह मेरे दिल में कांटे की तरह चुभता रहा है।