ओम प्रकाश राजभर
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सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर बिहार में एक बड़ी जनसभा करने वाले हैं। पिछड़ा वर्ग के इस जनसभा के लिए सात अक्तूबर की डेट भी तय हो चुकी है। इसी दिन वह लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का भी एलान करेंगे।
भाजपा से बढ़ती नजदीकियों के बीच ओम प्रकाश राजभर के इस एलान के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सवाल ये है कि आखिर ओम प्रकाश राजभर बिहार में रैली क्यों करना चाहते हैं? इसके जरिए वह कौन सा सियासी संदेश देना चाहते हैं? आइए समझते हैं...
पहले जानिए पिछले कुछ दिनों में ओपी राजभर ने क्या-क्या किया?
ओम प्रकाश राजभर ने पिछले कुछ दिनों में भाजपा के कई दिग्गज नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम बृजेश पाठक, मंत्री दयाशंकर सिंह समेत कई नेताओं से पिछले एक महीने के अंदर ओपी राजभर मिल चुके हैं।
वह लगातार समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर हमलावर हैं। पिछले दिनों उन्होंने बयान दिया था कि अखिलेश को गठबंधन का धर्म निभाना नहीं आता है। आरोप लगाया कि पहले अखिलेश ने उन्हें धोखा दिया और अब रालोद के मुखिया जयंत चौधरी को दे रहे हैं।
राजभर का कहना है कि रालोद को लोकसभा चुनाव में सपा बहुत कम सीटें देना चाहती है। जयंत ये कभी नहीं मानेंगे। इस बीच, राजभर ने सात अक्तूबर को पटना में एक बड़ी रैली करने का भी एलान कर दिया है। राजभर ने ये भी कहा कि वह इस दिन लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का एलान कर देंगे।
पटना की रैली क्यों कर रहे राजभर?
पटना में विपक्षी एकता के लिए 23 जून को बैठक हुई थी। इस बैठक में कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू, सपा समेत कई विपक्षी दलों को बुलाया गया था। हालांकि, सुहेलदेव भारतीय समाज, हम जैसी कई पार्टियों को नजरअंदाज भी किया गया।
जीतनराम मांझी पहले ही भाजपा की अगुआई वाली एनडीए में शामिल हो चुके हैं। मांझी ने जेडीयू, आरजेडी पर दलितों, वंचितों के हितों के साथ खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया। अब पटना में ही ओपी राजभर ने पिछड़ा वर्ग की एक बड़ी रैली बुलाई है। कहा जा रहा है कि जिस तरह से मांझी ने दलितों, आदिवासियों और महादलितों का नाम लेकर विपक्षी एकता पर निशाना साधा, उसी तरह अब ओपी राजभर पिछड़ा वर्ग का नाम लेकर जेडीयू-आरजेडी और सपा पर निशाना साधने की कोशिश करेंगे।
राजभर का छिटकना विपक्ष के लिए कितना बड़ा झटका?
राजभर अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। वह अपने जैसे छोटे दलों को साथ लेकर चलने की बात करते हैं। छोटे दलों का बड़े पैमाने पर भले ही आधार न हो, लेकिन जातिगत वोटर्स के बीच अच्छी पकड़ होती है। राजभर की कोशिश यूपी-बिहार के छोटे दलों को वह एकमंच पर लाने की है। इनमें से ज्यादातर दलों का झुकाव भाजपा नीत एनडीए की ओर है। ऐसे में विपक्षी एकता को झटका लग सकता है। खासतौर पर दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों को।
यूपी में कितनी है राजभर की ताकत?
यूपी में 403 विधानसभा सीटों में सौ से अधिक सीटों पर राजभर समाज का ठीक-ठाक वोट है। खासतौर से पूर्वांचल के दो दर्जन से अधिक जिलों की सीटों पर राजभर वोट निर्णायक हैसियत में है। वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया, मऊ आदि जिलों की सीटों पर 18-20 फीसदी वोट राजभर समाज का माना जाता है।
इसके अलावा अयोध्या, अंबेडकरनगर, गोरखपुर, संतकबीरनगर, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती में भी दस फीसद तक राजभर समाज के वोटर हैं। यही कारण रहा कि भाजपा ने वर्ष 2017 के चुनाव में राजभर समाज का मजबूत प्रतिनिधित्व कर रहे सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर से हाथ मिलाया और आठ सीटें दीं जिसमें सुभासपा चार जीतने में कामयाब रही। ओम प्रकाश मंत्री बने, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पिछड़े को सौंपने की मांग के सहित सरकार में अपनी उपेक्षा से नाराजगी दिखाने पर योगी सरकार से बाहर हो गए।
2022 में सुभासपा ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और छह सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि, चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया। अब वापस राजभर की नजदीकियां भाजपा की तरफ बढ़ रहीं हैं। बिहार की बात करें तो यहां भी ओपी राजभर की यूपी से सटे इलाकों में ठीक ठाक पकड़ है। इसके अलावा ओपी राजभर अन्य पिछड़ी जातियों को भी अपने साथ जोड़कर चलने का दावा करते हैं।