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ग्राउंड रिपोर्ट: इस बॉर्डर पर बीएसएफ जवानों को कहा जाता है 'काउ ब्वाय' ...ऐसा क्यों ?

Sat, 27 Jul 2019 07:41 PM IST
Trainee Trainee जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
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गौ तस्करी - फोटो : अमर उजाला
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बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल, इसे फ़र्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस भी कहते हैं, मगर भारत-बांग्लादेश के 4156 किलोमीटर लंबे बॉर्डर पर इस फोर्स को 'गौ रक्षक' या 'काउ ब्वाय' कहा जाता है। बॉर्डर के इलाकों में गाय को गौरु कहते हैं। गौरु को बांग्लादेश जाने से रोकने के लिए बीएसएफ के जवान दिन-रात तस्करों से जूझते रहते हैं। नदी-नाले, पहाड़ और दलदल, जहां सीमा पर कंटीले तार नहीं लगे हैं, वहां बीएसएफ वाले गौ रक्षक बन जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि बीएसएफ जिन गायों को तस्करों से मुक्त कराती है, तस्करों के गैंग लोकल पुलिस या कस्टम से बोली में उन्हीं गायों को छुड़ा लेते हैं। बांग्लादेश की सीमा में पहुंचाने के लिए गायों को नदी में डाल दिया जाता है। तस्कर उनके गले में एक देशी बम भी लगा देते हैं, ताकि बीच में बीएसएफ वाले उन्हें पकड़े तो वे उसकी मार से घायल हो जाएं।

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भारत के सीमावर्ती इलाके मुर्शिदाबाद, मालदा, कूचबिहार और धुबरी आदि में बड़े पैमाने पर गायों की तस्करी होती है। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के नोर्थ वेस्ट रीजन के कमांडर ब्रिगेडियर जलाल गनी के मुताबिक, बांग्लादेश साइड में राजशाही, छपैनावाबगंज, कुरिग्राम, पटग्राम और बुरीमारी आदि इलाकों में गायों को पकड़ा जाता है। ब्रिगेडियर जलाल गनी का आरोप है कि हमारी सीमा में भारत से गौरु आते हैं। सीमा पार से तस्करी होती है। वे बीएसएफ पर अप्रत्यक्ष आरोप लगाते हैं कि उनकी मदद से गौरु की तस्करी हो रही है। हालांकि वे यह बात भी मान लेते हैं कि इस तस्करी को रोकना संभव नहीं है। उनकी इस बात का जवाब देते हुए बीएसएफ के अधिकारी कहते हैं कि हम दिन-रात गायों की तस्करी रोकने के लिए दौड़ते रहते हैं। तस्कर हमारे ऊपर बम तक फेंक देते हैं। ऐसे में हम गायों की तस्करी क्यों कराएंगे।

बांग्लादेश बॉर्डर पर बह रही नागर नदी। - फोटो : Amar Ujala
बीएसएफ अधिकारी ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि सीमा पार गायों की तस्करी का यह धंधा गैर-कानूनी नहीं माना जाता। इसे वहां पर कैटल ट्रेड का नाम दिया गया है। बांग्लादेश सरकार ने इसे अपने राजस्व का जरिया बना लिया है। सीमा पार स्थानीय प्रशासन एक गाय को आगे जाने की एवज में पांच सौ टका लेता है। यह राशि टैक्स के रुप में ली जाती है। तस्करों को इसकी स्लिप भी मिलती है।बॉर्डर पर गायों की तस्करी से सालाना 16 सौ करोड़ रुपये का कारोबारा होता है।

बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) की रिपोर्ट: 

2016 में 530878 गौरु पकड़े हैं 
2017  —8900
2018  —5151 
2019  —2412 

बीएसएफ हर साल करीब डेढ़-दो लाख गायों को पकड़ती है। 2016 में 1.74 लाख गाय पकड़ी थी, जबकि 2017 में यह संख्या 1.11 लाख रही है। पिछले साल भी इतनी ही गायों को तस्करों से मुक्त कराया गया है।
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पद्ममा नदी, इसे भारत में गंगा नदी कहते हैं। - फोटो : अमर उजाला
बड़ा सवाल: गायों से भरे ट्रक बॉर्डर के निकट तक कैसे पहुंच जाते हैं... 

बीएसएफ के अधिकारी बताते हैं कि देश के कई राज्यों से गाय भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर लाई जाती हैं। अब सवाल यह उठता है कि इन राज्यों से लेकर बॉर्डर के करीब आने वाले रास्ते में कितने चैक प्वाइंट, नाके या बेरियर मिलते हैं। कस्टम, पुलिस और आरटीओ जैसे विभाग भी 24 घंटे डयूटी पर रहते हैं।इन सबके बावजूद गाय बॉर्डर पर पहुंच जाती हैं। इतना ही नहीं, बॉर्डर के आसपास गाय हॉट बने हुए हैं। गायों को तस्करों के कब्जे से छुड़ाकर बीएसएफ उन्हें पुलिस या कस्टम वालों के हवाले कर देती है। अब देखिये खेल, वहां पर इन गायों को तस्कर ही कुछ रुपये देकर छुड़ा लेते हैं।अगर बोली लगाने में दो-चार दिन का समय लग जाए तो गायों को संभालने की जिम्मेदारी बीएसएफ की होती है। वे गायों को खिलाते-पिलाते हैं।कोई पशु बीमार है तो उसका इलाज भी कराते हैं।गाय भागकर इधर उधर न चली जाए, इसका ध्यान भी बीएसएफ रखती है। मतलब यह है कि जो गाय किसी राज्य से बॉर्डर तक पहुंच गई है, वह वापस नहीं जाएगी। उसे तो बांग्लादेश जाना ही है।स्थानीय प्रशासन ने ऐसी कोई योजना नहीं बनाई है कि बीएसएफ द्वारा पकड़ी गई गायों को किसी गउशाला में छोड़कर आएं। यह भी देखने को मिलता है कि कस्टम या संबंधित विभाग के अधिकारी बोली के लिए तीन-चार दिन तक नहीं पहुंचते। कई बार वे बीएसएफ को ही बोली लगाने के लिए कह देते हैं। बोली में हर गाय का हिसाब किताब रखना कितनी मुश्किल का कार्य होता है, इसका अंदाजा लगा सकते हैं।कई गाय बोली खत्म होने से पहले भाग जाती हैं। बीएसएफ उनकी खोज में निकलती है।

भारत सरकार का दबाव, बॉर्डर पर गैर-कानूनी हरकत करने वालों के खिलाफ घातक हथियारों का इस्तेमाल न करें...

बीएसएफ को सख्त हिदायत दी गई है कि वह बॉर्डर पर नॉन लीथल यानी घातक हथियारों का इस्तेमाल न करें। इसका खामियाजा जवानों को भुगतना पड़ता है।जहां पर फैंसिंग नहीं होती, वहां बांग्लादेश की ओर से तस्करों द्वारा बीएसएफ जवानों पर देशी गन और बमों से हमला कर दिया जाता है। बशीरहट, नॉर्थ 24 परगना का 55 किलोमीटर लंबा नदी क्षेत्र तस्करी का केंद्र माना जाता है।यहां कंटीले तार नहीं हैं। गायों को केले के तने से बांधकर नदी में फेंक दिया जाता है। बीएसएफ वाले नदी के तेज बहाव में अपनी जान जोखिम में डालकर इन गायों को बचाने का प्रयास करते हैं।बीएसएफ वाले गायों को पकड़ न सकें, इसके लिए वे गाय के गले में एक बम बांध देते हैं। जैसे ही बीएसएफ के जवान गाय के गले में पड़ी रस्सी खींचते हैं, बम फट जाता है।

शरारती तत्वों ने इतने बीएसएफ जवानों को किया घायल 

2010   57
2011   147 
2012   146  
2013   112
2014   88 
2015   102  
2016   109 
2017   122 
2018   67  
2019   45 

बीएसएफ पर हुए हैं इतने हमले  

2010  90
2011  142  
2012  121 
2013  263 
2014  258 
2015  363   
2016  348  
2017  71  
2018  87   
2019  47  
 
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