भाजपा नेता का कहना है कि पार्टी को इस हार की ईमानदारी से समीक्षा करनी चाहिए। हम लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर आए थे। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे, भाजपा के साफ-सुथरे उम्मीदवार और पुराने नेताओं के भरोसे मुमकिन हो पाया। संगठनात्मक क्षमता से यह जीत हासिल हुई थी।
चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही भटक गया भाजपा का प्रचार
33 साल पार्टी को दिए हैं। दावे से कह सकता हूं कि अक्टूबर-नवंबर तक जनता ममता बनर्जी के शासन से त्रस्त हो गई थी। भाजपा के नेताओं ने तृणमूल के ही नेताओं की मार खाकर पार्टी को खड़ा किया था, लेकिन जिस दिन से तृणमूल के दागी नेताओं की एंट्री शुरू हुई, भाजपा के बंगाल में दिन लदने लगे। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद भाजपा चुनाव प्रचार से बहक गया था। तृणमूल कांग्रेस बंगाली अस्मिता के बल पर चुनाव लड़ रही थी और हमारी पार्टी इसकी अहमियत को समझ ही नहीं पाई। अब नतीजा सामने है।