के. अन्नामलाई ने भाजपा से दिया इस्तीफा।
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लंबे समय तक यह कहा जाता रहा कि तमिलनाडु की राजनीति दो द्रविड़ पार्टियों पर ही आधारित है। पहली द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) और दूसरी अन्नाद्रमुक पर। स्थिति तो यह रहीं कि राष्ट्रीय राजनीति में लगातार वर्चस्व बनाने वाली भाजपा और कांग्रेस तक को यहां मुख्य दल के तौर पर जगह नहीं मिली और उन्हें दोनों द्रविड़ पार्टियों के पीछे रहकर ही चुनाव लड़ने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, इस भ्रांति को अभिनेता से नेता बने विजय ने तोड़ दिया। वह भी एक नई पार्टी- तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) बनाकर। दोनों द्रविड़ दलों के वर्चस्व को तोड़ने में विजय को महज दो साल का समय ही लगा।
अगर तमिलनाडु की राजनीति का हालिया इतिहास उठाकर देखा जाए तो सामने आता है कि कुछ ऐसी ही कोशिश कुछ समय पहले तक भाजपा के नेता के. अन्नामलाई ने भी की थी। इसके लिए न सिर्फ अन्नामलाई ने भाजपा से अन्नाद्रमुक को अलग करने की भरसक कोशिश कीं, बल्कि पार्टी को अकेले चुनाव लड़ाने तक पर जोर दिया। हालांकि, उनके दोनों ही फ्रंट पर निराशा हाथ लगी। आखिरकार इन कोशिशों में असफल रहने के बाद अन्नामलाई ने अब भाजपा का साथ छोड़ने का फैसला किया है। 2 जून (मंगलवार) को उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात के बाद भाजपा से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद अन्नामलाई ने नई पार्टी बना ली। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो अपनी आईपीएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अन्नामलाई अब अपना जनआंदोलन शुरू कर सकते हैं, जो कि आगे एक सियासी दल का रूप ले सकता है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर के. अन्नामलाई कौन हैं? उनका शुरुआती जीवन और पृष्ठभूमि क्या है? वे कितने शिक्षित हैं और राजनीति में आने से पहले तक क्या कर रहे थे? तमिलनाडु की सियासत में उन्होंने कैसे भाजपा और अपने प्रभाव को मजबूत किया? क्यों राज्य में उनके और भाजपा के बीच मतभेद हो गए, जिसके चलते अब अन्नामलाई को पार्टी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा? आइये जानते हैं...
क्या है के. अन्नामलाई का शुरुआती जीवन और पृष्ठभूमि?
के. अन्नामलाई का पूरा नाम कुप्पुसामी अन्नामलाई है। उनका जन्म 4 जून 1984 को तमिलनाडु के करूर जिले के थोट्टमपट्टी गांव में हुआ था। उनके पिता कुप्पुसामी और मां का नाम परमेश्वरी है। वह कोंगु वेल्लालर गाउंदर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो पश्चिमी तमिलनाडु में एक प्रमुख भूमि-स्वामी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समूह माना जाता है।
साल 2011 में उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा सफलतापूर्वक पास की। वह 2011 बैच के कर्नाटक कैडर के तहत भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी बने। यहां से उन्हें 'सिंघम' और 'सुपरकॉप' के तौर पर पहचान मिली। उनका पुलिस करियर काफी चर्चित रहा।
राजनीति में आने से पहले कैसा रहा पुलिस करियर?
- के. अन्नामलाई को कर्नाटक में उनके पुलिस करियर के दौरान सिंघम (तमिल में अर्थ- शेर) मिला था। इसकी मुख्य वजह उनका बेहद सख्त, निडर और बेखौफ पुलिसिंग स्टाइल रहा।
- कर्नाटक के उडुपी, चिक्कमगलुरु और बंगलूरू दक्षिण में अपनी सेवा के दौरान, अन्नामलाई ने कानून व्यवस्था लागू करने के लिए एक बेहद सख्त और निडर रवैया अपनाया था।
- उडुपी में तैनाती के दौरान उन्होंने अपराधों पर लगाम कसने के लिए शानदार काम किया। इसके अलावा, मणिपाल में अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए उन्होंने कई नए पुलिसिंग सुधार पेश किए।
- उन्हें एक ऐसे 'सुपर-कॉप' के रूप में जाना जाता था, जो राजनीतिक या सांप्रदायिक दबावों के आगे नहीं झुकते थे और उपद्रवियों के खिलाफ बेझिझक सख्त कार्रवाई करते थे।
- उन्होंने सिर्फ अपराधियों पर ही सख्ती नहीं की, बल्कि शिक्षण संस्थानों में जाकर युवाओं के बीच नशीली दवाओं के दुरुपयोग और सड़क सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर जागरूकता अभियान भी चलाए।
- एक पुलिस अफसर के तौर पर उनका जनता के साथ गहरा जुड़ाव था। उनकी लोकप्रियता और सम्मान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्हें उडुपी के पुलिस अधीक्षक (एसपी) के पद से ट्रांसफर किया गया, तो स्थानीय लोगों ने इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।
पुलिस सेवा छोड़ने के बाद एनजीओ-खेती में भी आजमाया हाथ
अन्नामलाई ने मई 2019 में पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया था। तब वह बंगलूरू दक्षिण में पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) के पद पर थे।
पुलिस सेवा छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ समय तक खुद को सुर्खियों से दूर रखा और अपने एनजीओ वी द लीडर फाउंडेशन के जरिए राज्य के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक कल्याण के कार्य किए। अन्नामलाई की जैविक खेती में गहरी रुचि रही है। राजनीति में आने से पहले उन्होंने खेती-बाड़ी का अभ्यास किया और एक कृषि आधारित जीवन शैली को अपनाया। इस खाली समय के दौरान वह एक किताब लिखने पर भी काम कर रहे थे।
कैसे पुलिस सेवा के बाद राजनीति में हुई अन्नामलाई की एंट्री?
मई 2019 में पुलिस सेवा छोड़ने के फैसले के पीछे उन्होंने अपने शुभचिंतकों को एक चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने बताया था कि इस फैसले से पहले उन्होंने काफी गहराई से विचार किया था। उन्होंने बताया था कि 2018 की कैलाश मानसरोवर यात्रा ने जीवन को देखने के उनके नजरिए और प्राथमिकताओं को बदल दिया था। इसके अलावा, दिसंबर 2018 में स्वाइन फ्लू से उनके एक वरिष्ठ आईपीएस सहयोगी- मधुकर शेट्टी के आकस्मिक निधन ने भी उन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्हें अपने जीवन के लक्ष्यों को फिर से तय करने के लिए प्रेरित किया।
बताया जाता है कि शुरुआत में अन्नामलाई राजनीति में अपनी दिशा को लेकर स्पष्ट नहीं थे। इसी दौरान उन्होंने सुपरस्टार रजनीकांत से संपर्क किया था और वह उनकी राजनीतिक पार्टी के लॉन्च होने का इंतजार कर रहे थे। हालांकि, जब रजनीकांत की पार्टी अस्तित्व में नहीं आ सकी, तो अन्नामलाई ने अपना रुख बदल लिया। अंततः मई 2020 में एक फेसबुक लाइव सत्र के दौरान उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने की अपनी योजना की सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी।
अपनी घोषणा के तीन महीने बाद अगस्त 2020 में (40 वर्ष की आयु में) वह आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। अन्नामलाई ने एक मौके पर जिक्र किया था कि उन्होंने भाजपा को इसलिए चुना, क्योंकि उनका मानना था कि देश को राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की जरूरत है, और भाजपा एक ऐसी राष्ट्रवादी पार्टी है जो योग्यता के आधार पर नेताओं को मंच प्रदान करती है। इसके उलट उन्होंने क्षेत्रीय द्रविड़ पार्टियों को पारिवारिक उद्यम बताकर उनकी आलोचना की थी।
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तमिलनाडु की सियासत में कैसे मजबूत हुए अन्नामलाई, पार्टी के लिए क्या किया?
भाजपा की कमान और स्वतंत्र पहचान पर रहा जोर: राजनीति में कदम रखने के बाद उनका ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर गया। भाजपा में शामिल होने के कुछ ही हफ्तों के भीतर उन्हें तमिलनाडु इकाई का उपाध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद जुलाई 2021 में उन्हें एल. मुरुगन की जगह तमिलनाडु का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने द्रविड़ पार्टियों- द्रमुक और अन्नाद्रमुक के प्रभुत्व वाले राज्य में भाजपा को अपने दम पर खड़ा करने और एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में पेश करने की जोरदार वकालत की। इसके तहत उन्होंने पारंपरिक सहयोगी- अन्नाद्रमुक पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया।
जनसंपर्क अभियान (एन मन्न, एन मक्कल): अपनी और पार्टी की राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए अन्नामलाई ने जुलाई 2023 में 'एन मन्न, एन मक्कल' (मेरी मिट्टी, मेरे लोग) नाम से एक विशाल पदयात्रा शुरू की। इस 168 दिवसीय यात्रा के दौरान उन्होंने राज्य के सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया, जिससे उन्हें आम जनता के बीच अपनी पहचान बनाने और पार्टी का संदेश घर-घर तक पहुंचाने में जबरदस्त मदद मिली।
द्रमुक के भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक रुख: अन्नामलाई ने सत्तारूढ़ दल- द्रमुक के खिलाफ बेहद आक्रामक अभियान चलाए। उन्होंने डीएमके फाइल्स के नाम से ऑडियो और दस्तावेज जारी किए, जिसमें मुख्यमंत्री एमके. स्टालिन के रिश्तेदारों और मंत्रियों, जैसे सेंथिल बालाजी और के. पोनमुडी पर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए गए। उनके इस सीधे टकराव वाले रवैये ने उन्हें काफी राजनीतिक सुर्खियां दिलाईं।
राजनीतिक विमर्श में बदलाव और युवाओं से जुड़ाव: तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति अक्सर जातिगत समीकरणों, कल्याणकारी योजनाओं और फिल्मी सितारों के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन अन्नामलाई ने अपने विमर्श को सुशासन, विकास, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था और तमिल पहचान पर केंद्रित किया। इस नए दृष्टिकोण ने उन शहरी, शिक्षित और पहली बार वोट देने वाले युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया जो मौजूदा द्रविड़ राजनीति से मोहभंग का शिकार थे।
सिंघम की बेखौफ छवि: एक निडर आईपीएस अधिकारी के रूप में कमाई गई उनकी सिंघम की छवि ने उनके राजनीतिक करियर में भी उनके साथ रही, जिससे उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखा गया, जिन्होंने खुद अपनी जगह बनाई और जो द्रविड़ पार्टियों की वंशवाद की राजनीति से बिल्कुल अलग थे।
कैसे अन्नामलाई और भाजपा के बीच मतभेद हो गए?
1. अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन को लेकर वैचारिक मतभेद
अन्नामलाई की रणनीति भाजपा को तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियों पर निर्भर रहने के बजाय एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करने की थी। उनके आक्रामक रवैये और एनडीए में भाजपा की साथी पार्टी- अन्नाद्रमुक के नेताओं को निशाना बनाना भाजपा आलाकमान को अखर गया। खासकर तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक के प्रमुख एदापद्दी के. पलानीस्वामी पर अन्नामलाई के तीखे हमलों के कारण सितंबर 2023 में अन्नाद्रमुक ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया था।
2. अन्नाद्रमुक के लिए तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष पद से हटाए गए
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य में एक भी सीट नहीं मिली। अन्नाद्रमुक के नेताओं ने इसका ठीकरा अन्नामलाई पर फोड़ा। ऐसे में 2026 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन को फिर से जोड़ना चाहता था। कथित तौर पर एआईएडीएमके नेता पलानीस्वामी ने भाजपा के साथ गठबंधन में लौटने के लिए अन्नामलाई को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटाने की पूर्व शर्त रखी थी। इसी कारण अप्रैल 2025 में भाजपा ने उन्हें किनारे करते हुए उनकी जगह नैनार नागेंद्रन को राज्य अध्यक्ष बना दिया।
3. गुटबाजी और वॉर रूम का विवाद
नए प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन और अन्नामलाई के बीच तीखी गुटबाजी सामने आई। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने सख्त निर्देश दिए कि अन्नामलाई के समर्थक और उनके सोशल मीडिया वॉर रूम के सदस्य अन्नाद्रमुक नेताओं और नागेंद्रन के खिलाफ पोस्ट करना बंद करें। इसी बीच, भाजपा नेतृत्व की तरफ से अन्नामलाई के एक प्रमुख समर्थक (जॉनी राजा) को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, जिससे उनके समर्थक भड़क गए।
4. सीट बंटवारे से भारी नाराजगी
2026 के विधानसभा चुनावों के लिए अन्नाद्रमुक की तरफ से भाजपा के लिए छोड़ी गई सीटों से अन्नामलाई बेहद नाखुश थे। उन्होंने अपनी नाराजगी जताते हुए छह निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव प्रभारी पद से इस्तीफा दे दिया और खुद चुनाव लड़ने से भी साफ इनकार कर दिया। इसके अलावा अन्नामलाई ने ओ. पन्नीरसेल्वम और टीटीवी दिनाकरण को भी एनडीए में शामिल करने का पक्ष रखा था, लेकिन नए नेतृत्व ने अन्नाद्रमुक से गठबंधन बनाए रखने के लिए कथित तौर पर उनकी मांगों का समर्थन नहीं किया।
5. फिर धीरे-धीरे दूरी बनाई, चुनाव भी नहीं लड़े
पार्टी के अंदर अपनी स्वायत्तता छिनने और स्वतंत्र पहचान के विचार को द्रविड़ियन राजनीति के दबाव में कमजोर होते देख, अन्नामलाई ने धीरे-धीरे भाजपा से दूरी बना ली। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी व्यवहार के चलते बाद में उन्होंने खुद को विधानसभा चुनाव से भी काफी हद तक दूर ही रखा। यहां तक कि उन्होंने खुद भी चुनाव नहीं लड़ा था।
अन्नामलाई के लिए अब आगे क्या?
हालिया घटनाक्रमों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, के. अन्नामलाई ने भाजपा को छोड़ने और अपना स्वतंत्र राजनीतिक सफर शुरू करने का मन बना लिया है। 2 जून (मंगलवार) को वो अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं, जैसे- गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से मिलने दिल्ली पहुंचे, ताकि वह औपचारिक रूप से पार्टी से सौहार्दपूर्ण तरीके से अलग होने के अपने फैसले की जानकारी दे सकें और अब तक मिले मौकों के लिए नेतृत्व को धन्यवाद कह सकें।
बताया गया है कि अन्नामलाई एक स्वतंत्र जमीनी संगठन या जन आंदोलन शुरू करने का खाका तैयार कर रहे हैं। अटकलें हैं कि इस संगठन का नाम मक्कल शक्ति इयक्कम (पीपुल्स पावर मूवमेंट) हो सकता है। यह भी अनुमान हैं कि इसका नाम सुपरस्टार रजनीकांत के लोकप्रिय किए गए किसी वाक्यांश पर रखा जा सकता है। शुरुआत में यह एक जन आंदोलन होगा, जिसे बाद में एक पूर्ण राजनीतिक पार्टी में बदल दिया जाएगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नए संगठन के जरिए वह पार्टी नेताओं पर निर्भर रहने के बजाय एक सीधा और विकेंद्रीकृत नेटवर्क बनाना चाहते हैं। उनकी नजर मुख्य रूप से शिक्षित शहरी और अर्ध-शहरी युवाओं पर है। अन्नामलाई का मानना है कि आने वाले समय में जो युवा और लोग पारंपरिक द्रविड़ राजनीति या अभिनेता विजय की नई पार्टी टीवीके से लोग निराश होंगे, वे उनके साथ जुड़ेंगे। इसके अलावा, उन्हें उम्मीद है कि भाजपा के कई मौजूदा मतदाता भी उनके समर्थन में आ सकते हैं।
कुल मिलाकर, देखा जाए तो अन्नामलाई ने भले ही अपने राजनीतिक करियर में अब तक कोई चुनाव नहीं जीता है, लेकिन तमिलनाडु में उनके समर्थकों की भारी भीड़, राज्य की तेजी से बदलती राजनीति और एक युवा नेता के रूप में उनकी छवि अब भी मजबूत है। ऐसे में अब यह देखना बाकी है कि बिना चुनाव जीते भारी प्रभाव बनाने वाले अन्नामलाई अपनी लोकप्रियता को चुनावी जीत में बदल पाते हैं या नहीं।