दिल्ली उच्च न्यायालय में शुरू किया था अभ्यास
उन्होंने 12 जनवरी 1982 को एक वकील के रूप में नामांकन किया और दिल्ली उच्च न्यायालय में अभ्यास करना शुरू कर दिया था । बाद में उन्होंने 1983 में केरल के उच्च न्यायालय में अपना अभ्यास स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद, 1986 में उन्होंने स्वतंत्र अभ्यास शुरू किया और नागरिक, संवैधानिक और रिट मामलों में विशेषज्ञता प्राप्त की।
केरल उच्च न्यायालय के बने न्यायाधीश
न्यायमूर्ति जोसेफ 14 अक्टूबर, 2004 को केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने थे। बाद में उन्हें 18 जुलाई, 2014 को तत्कालीन सीजेआई राजेंद्र मल लोढ़ा की सिफारिश पर, भारत के राष्ट्रपति ने जोसेफ को उत्तराखंड के अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया। बाद में, उसी साल उन्होंने 31 जुलाई को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 9वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।
पहले सरकार ने न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी वापस
अगस्त 2018 में शीर्ष अदालत में उनकी पदोन्नति ने सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को समाप्त कर दिया था। वहीं, 10 जनवरी, 2018 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने जोसेफ को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने के लिए सिफारिश की थी। लेकिन उनकी वरिष्ठता में कमी होने के चलते सरकार ने अप्रैल 2018 में सिफारिश वापस कर दी थी।
कॉलेजियम ने मई 2018 में फिर न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश की। अगस्त में वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनें।
कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए
न्यायमूर्ति जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तराखंड राज्य में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा 2016 में राष्ट्रपति शासन लगाने को रद्द कर दिया था। केरल उच्च न्यायालय में एक न्यायाधीश होने के दौरान, न्यायमूर्ति जोसेफ की एक खंडपीठ ने अलाप्पुझा जिले में नेदियाथुरुथु द्वीप पर अवैध रूप से निर्मित कपिको रिसॉर्ट्स को ध्वस्त करने का आदेश भी दिया था।
शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में अपने चार साल और 10 महीने के कार्यकाल के दौरान, न्यायमूर्ति जोसेफ ने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए। सबसे महत्वपूर्ण फैसला चुनाव में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए लिया था। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा करने का फैसला दिया था। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई शामिल हैं।
मोदी सरकार को दी थी क्लीन चिट
न्यायमूर्ति जोसेफ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने इस साल अप्रैल में सभी राज्यों को बिना किसी शिकायत के नफरत फैलाने वाले भाषण देने वालों के खिलाफ मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। उन्होंने इन भाषणों को देश के प्रति गंभीर अपराध बताया था। इसके अलावा वह उस बैंच का भी हिस्सा रहे हैं, जिसमें राफेल फाइटर जेट्स की खरीद पर मोदी सरकार को क्लीन चिट दी थी।
शीर्ष अदालत ने 14 दिसंबर, 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उसने कहा था कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई अवसर नहीं है।
पिछले साल नवंबर में, न्यायमूर्ति जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में नवी मुंबई की तलोजा जेल में बंद कार्यकर्ता गौतम नवलखा को उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण नजरबंद करने की अनुमति दी थी।